Monday, September 26, 2016

हि‍न्‍दी तुलनात्‍मक साहि‍त्‍य के प्रथम आचार्य : जानकीवल्लभ शास्त्री



छायावादोत्तर काल के सुविख्यात कवि आचार्य जानकीवल्लभ शास्त्री  का जन्‍म 05 फरवरी 1916 को मैगरा गाँव (गया, बि‍हार) में और नि‍धन 07 अप्रैल, 2011 को मुजफ्फरपुर (बि‍हार) में हुआ। उनके सक्रि‍य साहि‍त्‍यि‍क जीवन का कर्म-क्षेत्र मुजफ्फरपुर ही है। हि‍न्‍दी में रचि‍त उनकी कुल ति‍रपन कृति‍यों (बीस काव्य-संग्रह, पाँच आलोचना-संग्रह, तीन संगीतिका, चार नाटक, पाँच उपन्यास, पाँच कहानी संग्रह, एक ग़ज़ल संग्रह, एक महाकाव्य, सात संस्मरणात्‍मक कृति‍याँ, दो ललित निबन्‍ध-संग्रह) के अलावा संस्‍कृत में भी कई रचनाएँ उपलब्‍ध हैं। प्रारम्‍भ में वे संस्कृत में ही कविताएँ लिखते थे। महाकवि निराला की प्रेरणा से वे हिन्‍दी में आए। नि‍र्लि‍प्‍त साहि‍त्‍य-सेवा हेतु उन्‍हें भारत-भारती, राजेन्द्र शिखर सम्मान, शिवपूजन सहाय सम्मान से सम्‍मानि‍त कि‍या गया। आत्‍म-गौरव के प्रति‍ वे इतने दृढ़ रहते थे कि‍ दो बार (सन् 1994 और सन् 2010 में) उन्होंने भारत सरकार का पद्मश्री सम्मान लेने से मना कर दिया। 
वे संस्‍कृत, हिन्दी, बांग्ला, अंग्रेज़ी... अनेक भाषाओं में पारंगत थे। अल्‍पायु में ही वे अपने बहुभाषि‍क ज्ञान, वि‍षद अध्‍ययन और आलोचनात्‍मक वि‍वेक से परि‍पूर्ण रचना-दृष्‍टि‍ के लि‍ए ख्‍यात हो गए थे। उनकी आलोचनात्‍मक कृति‍याँ यद्यपि‍ पाँच ही हैं, पर अनुवर्ती पीढ़ि‍यों की शोध-दृष्‍टि‍ वि‍कसि‍त करने हेतु वे पर्याप्‍त हैं। वे अपने सम्‍पूर्ण लेखन में वस्‍तुनि‍ष्‍ठता, प्रमाणि‍कता, नैति‍कता के प्रति‍ आग्रहशील दि‍खते हैं। जनहि‍त एवं राष्‍ट्रहि‍त में रचनाओं की उपादेयता पर उनकी सावधानी एवं पाठ के प्रति‍ सहृदयता सदैव बनी रहती है। बहुभाषि‍क ज्ञान की बदौलत उन्‍हें मूल-पाठ के अवगाहन की सुवि‍धा थी। भाषा-ज्ञान की इस सुवि‍धा के परि‍पाक से नि‍श्‍चय ही उनका तुलनात्‍मक अध्‍ययन सम्‍पुष्‍ट हुआ होगा, कि‍न्‍तु तुलनात्‍मक-अध्‍ययन के लि‍ए इतना ही पर्याप्‍त नहीं होता। बेहतर तुलनात्‍मक-अध्‍ययन के लि‍ए वि‍वेकशील आलोचना-दृष्‍टि‍ की बड़ी भूमि‍का होती है। 
उल्‍लेखनीय है कि‍ बहुभाषा-ज्ञान एवं वि‍लक्षण आलोचना-दृष्‍टि के साथ-साथ सबद्ध साहि‍त्‍य-धाराओं की सूक्ष्‍मता से भी जानकीवल्लभ का गहन परि‍चय था। आलोचना-दृष्‍टि‍ में हासि‍ल महारत के कारण उन्‍होंने कभी कि‍सी रूढ़ हो गई विचारधारा की लीक नहीं पीटी। साहि‍त्‍य-सृजन हेतु उनकी अपनी जीवन-दृष्‍टि‍ थी, जि‍सका कि‍सी राजनीति‍क धारणा‍ से कोई करार न था। उनका जीवन-दर्शन अनुभूत-सत्‍य और नागरि‍क-जीवन की तर्कपूर्ण व्‍यवस्‍था से नि‍र्धारि‍त था। रचनात्‍मक सन्‍धान हेतु वे सतत लय, रस, आनन्‍द और ज्ञान-दर्शन को प्रश्रय देते थे। सम्‍भवत: यही कारण हो कि‍ उनकी रचनाएँ भावकों को कोलाहल से दूर ले जाकर शान्‍ति और थि‍रता देती हैं। जीवनानन्‍द के बाधक तत्त्‍वों पर सहजतम कि‍न्‍तु घातक व्‍यंग्‍य उनके यहाँ ठौर-ठौर दि‍खता है। आनन्‍द उनके यहाँ पाने की वस्‍तु है, छीनने की नहीं। कि‍न्‍तु जानकीवल्लभ शास्त्री की आलोचना-दृष्‍टि‍ पर वि‍चार करने से पूर्व एक नजर हिन्दी की आरम्‍भिक आलोचना के वि‍कास-क्रम पर डालते हैं।
तथ्‍यत: आरम्‍भिक हिन्दी आलोचना का वि‍कास साहित्यिक वाद-विवाद से हुआ है। भारतेन्दु हरि‍श्‍चन्‍द्र के नाटक शीर्षक निबन्‍ध, लालाश्रीनिवास दास रचि‍त नाटक संयोगिता स्वयंवर, पृथ्वीराज रासो की मौलि‍कता, भारतेन्दु युग में गद्य-पद्य की भाषा, भारतेन्दु रचि‍तपूर्ण प्रकाश और चन्द्रप्रभा के मौलिक या अनूदित होने के तर्क-वि‍तर्क, सन् 1850-1900 तक के समय को भारतेन्दु युग (जबकि‍ उनका जीवन काल सन् 1850-1885 ही है) की संज्ञा, तिलिस्मी घटनाओं से भरे उपन्यास चन्‍द्रकान्ता और चन्द्रकान्ता सन्तति की संरचना एवं घटनाक्रम के सम्‍भव-असम्‍भवहोने के तर्क, प्रेमचन्‍द रचि‍त प्रेमाश्रम पर रघुपति सहाय फिराक की प्रशंसात्मक और हेमचन्द्र जोशी की धज्जियाँ उड़ाती टि‍प्‍पणी, आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी के समय में भाषा की अनस्थिरतापर बहस, देव-बिहारी विवाद, हिन्दी नवरत्नवि‍वाद, रीतिवाद बनाम स्वच्छन्दतावाद, छायावाद काल में कविता के स्वरूप, भाषा और छन्‍द सम्‍बन्‍धी वि‍वाद...बेशुमार वि‍वाद हैं, जि‍नके व्‍यवस्‍थि‍त तर्कों और कई कुतर्कों से टकराकर हि‍न्‍दी आलोचना पुष्‍ट हुई है, और साहि‍त्‍य की वि‍भि‍न्‍न वि‍धाओं में सम्‍भावनाओं के नए-नए अँखुवे फूटे हैं। इन बहसों की शुरुआत सन् 1885 से हुई, और बहस बढ़ती गई। हि‍न्‍दी-आलोचना और साहि‍त्‍येति‍हास-लेखन का रूप नि‍खरता गया। 
बीसवीं शताब्‍दी के चौथे दशक का अन्‍त आते-आते हि‍न्‍दी में कई तरह के वि‍स्‍मयकर बदलाव परि‍लक्षि‍त हुए। उस काल तक आचार्य रामचन्‍द्र शुक्‍ल की प्रखर आलोचना-दृष्‍टि‍ से लोग परि‍चि‍त हो गए थे। नन्‍ददुलारे वाजपेयी, हजारीप्रसाद द्वि‍वेदी एवं रामवि‍लास शर्मा जैसे समालोचकों की आलोचना-दृष्‍टि‍ आकार लेने लगी थी। अल्‍प-वय जानकीवल्लभ शास्त्री की प्रखर आलोचनात्‍मक-दृष्‍टि की पहचान उन्‍हीं दि‍नों हुई। उसी बहुज्ञ पर्यवस्‍थि‍ति‍‍ में उनके आलोचनात्‍मक लेख पत्रि‍काओं में सम्‍मान पाने लगे। सन् 1936-1941 के बीच लि‍खे उनके नि‍बन्‍धों का बहुचर्चि‍त संकलन साहि‍त्‍य-दर्शन का पहला संस्‍करण (सन् 1943) आया। बीस-पचीस वर्ष की आयु में लि‍खे गए इन आलेखों को सुधी पाठकों का पर्याप्‍त सम्‍मान मि‍ला। हि‍न्‍दी के सुवि‍ख्‍यात आलोचक आचार्य रामचन्‍द्र शुक्‍ल के उत्‍कर्ष-काल में जानकीवल्‍लभ शास्‍त्री की आलोचना-दृष्‍टि‍ को मि‍ली वह जनस्‍वीकृति‍ दि‍लचस्‍प थी। उन दि‍नों आचार्य शुक्‍ल के आलोचनात्‍मक लेखन की तूती बजती थी। कि‍न्‍तु जानकीवल्लभ शास्त्री ने उनके आलोचना-स्रोत की उस तीव्र धारा‍ को चुनौती देते हुए अपने लेख आलोचना का आदर्श में कहा कि‍ ''रामचन्‍द्र शुक्‍ल की आलोचनाएँ चरम-सत्‍य का फैसला नहीं देतीं। ऐसा करना उनकी शक्‍ति‍-सामर्थ्‍य के बाहर की बात है।''[1] कोई बेहतर आलोचकीय दृष्‍टि‍ का नमूना प्रस्‍तुत कि‍ए बगैर ऐसी उद्घोषणा असम्‍भव थी। अपने समय के स्‍थापि‍त समालोचक की आलोचना-दृष्‍टि‍ के शक्‍ति‍-सामर्थ्‍य को इस तरह चुनौती देना बहुत आसान नहीं था। इस वक्‍तव्‍य में छवि‍-भंग की अहंकारपूर्ण मंशा अथवा आत्‍ममुग्‍धता नहीं, बल्‍कि‍ एक सतर्क आत्‍मवि‍श्‍वास है। जाहि‍र है कि‍ उस आत्‍मवि‍श्‍वास का सूत्र आचार्य शास्त्री की आलोचकीय-क्षमता में तलाशना होगा। उनका यह आत्‍मवि‍श्‍वास गहन अध्‍यवसाय, तथ्यात्‍मक इति‍हास-बोध, मानवीय समाज-बोध एवं वि‍वेकशील तर्क-दृष्‍टि से परि‍पूर्ण था; जि‍सके प्रति‍मान उनके आलोचना-कर्म में तैनात हैं। 
हर सृजनशील मनुष्‍य उपलब्‍ध परि‍स्‍थि‍ति‍यों में अपनी प्रति‍भा, सुवि‍धा, अनुभव और सपनों के आश्रय से अपनी रचना-प्रक्रि‍या के लि‍ए जैसा दृष्‍टि‍कोण अर्जि‍त करता है वही उसकी जीवन-दृष्‍टि होती है। उसका सम्‍पूर्ण जीवन-क्रम उसी दृष्‍टि‍कोण से संचालि‍त होता है। जन, राष्‍ट्र एवं मानवीयता के पक्ष में उठी हुई उसकी हर चि‍न्‍ता और रचनात्‍मक-वि‍वेक उसी जीवन-दृष्‍टि‍ से नि‍र्देशि‍त रहता है। जीवन-दृष्‍टि नि‍र्धारि‍त कि‍ए बगैर जो कोई कलम उठाता है, वह लेखक नहीं, अपराधी है। आचार्य जानकीवल्लभ शास्त्री के पूरे रचनात्‍मक उद्यम में उनकी सुचि‍न्‍ति‍त जीवन-दृष्‍टि स्‍पष्‍ट दि‍खती है। वे बेहद जनसरोकारी, दायि‍त्‍वबोध-सम्‍पन्‍न, राष्‍ट्र-हि‍त भावना से परि‍पूर्ण लेखक थे। उनका शि‍क्षार्जन बेशक संस्‍कृत पद्धति‍ से हुआ, कि‍न्‍तु वे वि‍राट अध्‍ययन-फलक और उदार वैचारि‍क दृष्‍टि‍ के लोग थे। पाश्‍चात्‍य साहि‍त्‍य से भी उनकी अन्‍तरंगता थी। सन्‍तुलि‍त वि‍वेक-दृष्‍टि‍ और कर्मनि‍ष्‍ठ सृजनात्‍मकता के सारे प्रति‍मान उनके यहाँ तैनात मि‍लते हैं। जन एवं राष्‍ट्र के सर्वतोन्‍मुखी वि‍कास की चि‍न्‍ता उनकी रचनात्‍मकता का मूल उद्देश्‍य था। वे पल-पल इस दि‍शा में चि‍न्‍ति‍त दि‍खते हैं। इस चि‍न्‍ता से इतर साहि‍त्‍य के अस्‍ति‍त्‍व की कोई कल्‍पना उनके पूरे रचना-कर्म में कहीं नहीं दि‍खती। उनका गहन इति‍हासबोध, बहुवि‍ध अध्‍यवसाय, जन एवं राष्‍ट्र-हि‍त-चि‍न्‍ता सदैव उनके कहन की स्‍पष्‍टता और नि‍र्भीकता को पुष्‍ट करती है। 
अपनी वि‍शि‍ष्‍ट कृति‍ साहि‍त्‍य-दर्शन के चौथे संस्‍करण के प्रकाशन के समय सन् 1967 में 'वेदना' व्‍यक्‍त करते हुए उन्‍होंने उस दौर के अन्‍य समालोचकों की लेखकीय प्रति‍बद्धता पर भी इशारे में बात की। उन्‍होंने लि‍खा कि‍ ''जब यह (ग्रन्‍थ‍) पहली बार प्रकाशि‍त हुआ था, तब आज के 'अशोक के फूल'[2] नहीं खि‍ले थे, 'कल्‍पलता' का भी पता नहीं था, होता तो कम-से-कम मैं यह अवश्‍य समझ लेता कि‍ 'साहि‍त्‍य कोई गढ़कुण्‍डेश्‍वर के पुदीने का बगीचा नहीं है कि‍ वि‍न्‍ध्‍याटवी में भ्रमण करनेवाला प्रत्‍येक अराजकतावादी जन्‍तु उसमें नाक घुसेड़े। उसमें एक शृंखला है; एक वि‍धान है, एक उद्देश्‍य है, एक साधना है।'[3] इतना ही नहीं, तब 'हि‍न्‍दी साहि‍त्‍य : बीसवीं शताब्‍दी'[4] या 'आधुनि‍क साहि‍त्‍य'[5] के समान महान् आलोचनात्‍मक ग्रन्‍थ भी नहीं छपे थे, जो मेरे समकालीन वि‍शृंखल वि‍चारधारा को कूल-कि‍नारा बताते। साहि‍त्‍य-दर्शन के नि‍बन्‍ध (!) प्राय: बीस-बाइस की उम्र तक के हैं और मैंने अठारह-उन्‍नीस की उम्र से तो हि‍न्‍दी में लि‍खना शुरू ही कि‍या था।''[6] उल्लेखनीय है कि नन्ददुलारे वाजपेयी ने साहित्य-दर्शन शीर्षक पुस्तक के पहले संस्करण भूमिका लिखी है, और राष्ट्रकवि रामधारी सिंह दिनकर ने उस पहले संस्करण की समीक्षा की है।
अपनी आलोचना-दृष्‍टि‍ स्‍पष्‍ट करते हुए उन्‍होंने आलोचना का आदर्श शीर्षक लेख में साफ-साफ कहा कि‍ ''आदर्श आलोचना में यही देखा जाएगा कि‍ आलोच्‍य वि‍षय के साथ स्‍वयं तन्‍मय होकर वह कहाँ तक पाठक के संशय-सन्‍देह, जि‍ज्ञासा-कुतूहल को शान्‍त कर सकती है; उसे परि‍तृप्‍त तथा तन्‍मय कर सकती है; अपने में घुला-मि‍ला ले सकती है। उसे परमार्थ सत्‍य प्रदान करने का दम्‍भ तो करना ही नहीं चाहि‍ए। उसका काम पाठक के कि‍सी भाववि‍शेष, सौन्‍दर्यवि‍शेष की अनुभूति‍ के अयोग्‍य, अलस-नि‍मीलि‍त हृदय, स्‍वप्‍नि‍ल-तन्‍द्रि‍ल सहृदयता तथा सहानुभूति‍ को आवश्‍यकतानुसार उन्‍मि‍षि‍त, वि‍कसि‍त कर देना ही है। कृति‍कार के कलातत्त्‍व को उसने जैसा समझा उसे पाठक के हृदय में स्‍वच्‍छतया अंकि‍त कर देना, कलाकार ने जो कल्‍पना की पाठक को उसकी अनुभूति‍ करा देना, यही आदर्श आलोचना है।...आलोचक की सबसे बड़ी सफलता यही है कि‍ वह भ्रम से भी पाठक को यह सोचने का अवसर न दे कि‍ वे वि‍चार नि‍श्‍चि‍त रूप से मूल कृति‍कार के नहीं, अपि‍तु उसी आलोचक के हैं। और ऐसा तभी हो सकता है, जब वह आलोच्‍य वि‍षय के अन्‍तरंग में प्रवि‍ष्‍ट होकर, उसका मर्म मालूम करने के लि‍ए अहर्नि‍‍श साधना करता है, उससे एकतान होकर उसका अनाहत नाद सुन लेता है।''[7] 
वि‍डम्‍बना ही है कि जि‍स हि‍न्‍दी में बीस वर्ष के एक युवक की आलोचना-दृष्‍टि आठ दशक पूर्व ही इतनी परि‍पक्‍व हो गई थी, उस हि‍न्‍दी आलोचना का अधि‍कांश हि‍स्‍सा आज आलोचकीय दायि‍त्‍व से वि‍मुख है। आज के आलोचक आलोच्‍य वि‍षय के साथ तन्‍मय नहीं होते; पाठकों के संशय-सन्‍देह, जि‍ज्ञासा-कुतूहल को शान्‍त नहीं करते; पाठक को कृति‍कार के कलातत्त्‍व एवं कल्‍पना की अनुभूति‍ नहीं कराते; वे आलोच्‍य वि‍षय के अन्‍तरंग में प्रवि‍ष्‍ट नहीं होते, पाठ के मर्म तक पहुँचने हेतु साधना नहीं करते; रचना की अनाहत नाद सुनने की चेष्‍टा नहीं करते; वे मान्‍यता और पुरस्‍कार का प्रसाद बाँटते हैं। कृति‍यों और कृति‍कारों पर अवान्‍तर धारणाओं से फतवा जारी करते हैं। जानकीवल्‍लभ शास्‍त्री की आलोचना-दृष्‍टि‍ आलोचकों को ऐसा करने से बरजती है और गहरी अन्‍तर्दृष्‍टि‍ की ओर उन्‍मुख करती है। 
कारयि‍त्री और भावयि‍त्री प्रति‍भा की बहस से बाहर आकर सोचने पर सृजनशील साहि‍त्‍य भी अन्‍तत: जनजीवन की आलोचना होती है। जानकीवल्‍लभ शास्‍त्री की गहन आलोचना-दृष्‍टि के मद्देनजर उनका सम्‍पूर्ण रचनात्‍मक उद्यम मुझे समकालीन नागरि‍क-जीवन और आचार-संहि‍ता की ईमादार आलोचना ही लगती है। आलोचना को तो रचना का शेषांश माना जाता है। पर साहि‍त्‍यि‍क चर्चा में रचना है क्‍या? वह समकालीन भावयि‍त्री प्रति‍भा की सर्वेक्षण-परि‍णति‍ ही तो है! नागरि‍क-परि‍दृश्‍य में मनुष्‍य की आत्‍ममुग्‍धता, नि‍रर्थक बेचैनी और उद्देश्‍यवि‍हीन जीवन-यापन देखकर आचार्य शास्त्री को स्‍पष्‍ट दि‍खा कि‍--
सब अपनी-अपनी कहते हैं!
कोई न किसी की सुनता है,
नाहक कोई सिर धुनता है,
...
सब ऊपर ही ऊपर हँसते,
भीतर दुर्भर दुख सहते हैं!
ध्रुव लक्ष्य किसी को है न मिला,
सबके पथ में है शिला, शिला,
-मौज
बादलों की धृष्‍टता देखकर उन्‍हें गुस्‍सा आया, उसे उन्‍होंने फटकार लगाई, बादलों को उनकी अशक्‍यता याद दि‍लाई--
उतर रेत में, आक जवास भरे खेत में
पागल बादल,
शून्य गगन में व्‍यर्थ मगन मँड़राता है!
इतराता इतना सूखे गर्जन-तर्जन पर,
झूम झूम कर निर्जन में क्या गाता है?
...
रोमल, श्यामल मेष-शशक-सा विचर-विचर कर,
चरता है; परिणत गज-सा वह खेल दिखाता,
नटखट बादल,
जो भूखे-प्यासे को नहीं सुहाता है!
उतर रेत में, आक जवास भरे खेत में
चंचल बादल,
शून्य गगन में व्‍यर्थ मगन मँड़राता है!!
-कुपथ रथ दौड़ाता जो
गौर करने पर स्‍पष्‍ट होता है कि‍ मनुष्‍य, मानवीय आचरण, समाज-व्‍यवस्‍था, प्रकृति‍...हर कुछ को देखने, और उन पर अपनी राय कायम करने की बड़ी तटस्‍थ दृष्‍टि‍ उन्‍होंने प्रारम्‍भि‍क आयु में ही वि‍कसि‍त कर ली थी। जि‍स बादल को रसि‍क जन, प्रेमाकुल प्रेमी, कृषक समुदाय आदि‍ शुभागम मानते हैं; अपने सृजन-कौशल के सहारे जानकीवल्‍लभ शास्‍त्री ने उसी बादल को पागल, नटखट, बौड़म साबि‍त कर दि‍या। उसके सूखे गर्जन-तर्जन और निर्जन में झूम-झूम कर नर्तन-गायन करने को व्‍यर्थ करार दि‍या। उसकी क्षमता को ललकारा कि‍ पागल बादल, व्‍यर्थ ही शून्य गगन में क्‍या  मँड़राता है! हि‍म्‍मत है तो आ, रेत में उतर, आक जवास से भरे खेत में उतर, जो बात भूखे-प्यासे को नहीं सुहाती, वह क्‍यों करता है! प्राकृति‍क उपादानों से तैयार ये प्रतीकार्थ इस कवि‍ता में अर्थ की कई परतें खोलते हैं।
कहते हैं कि‍ बाल्‍यावस्‍था की असह पीड़ा मनुष्‍य के जीवन-बोध को तीक्ष्‍णतर और उज्‍ज्‍वल बनाती है। उनकी नैसर्गि‍क प्रति‍भा से परांग्‍मुख नहीं हुआ जा सकता, पर यह भी सम्‍भव है कि अल्‍पायु में हुए मातृशोक से उनकी चि‍न्‍तन-पद्धति‍ की दि‍शा बदली हो।‍ पर्यवस्‍थि‍ति‍ को देखने का उनका अन्‍दाज कुछ भि‍न्‍न हो गया था। उल्‍लेखनीय है कि‍ जि‍स दि‍न उन्‍होंने बनारस जाने की अपनी जि‍द अपनी माँ को सुनाई, उसके अगले ही दि‍न उनकी माँ ने शरीर त्‍याग दि‍या। बालक जानकीवल्‍लभ ने उस पीड़ा को ताउम्र अपने प्राणों पर झेला। कि‍न्‍तु मातृसुख से वंचि‍त होने के दुख का उन्‍होंने जीवन भर सकारात्‍मक उपयोग कि‍या। जीवन भर वंचि‍तों, साधनवि‍हीनों, पशु-पक्षि‍यों को प्रेम लुटाया, उनकी वकालत की। बेजुबानों के जुबान बननेवाले जानकीवल्‍लभ तभी तो बारि‍श को उसकी औकात बताते हैं, उसके अवांछि‍त और अभद्र आचरण का अहसास कराते हैं--
क्या खाकर बौराए बादल?
झुग्गी-झोंपड़ियाँ उजाड़ दीं
कंचन-महल नहाए बादल!
दूने सूने हुए घर
लाल लुटे दृग में मोती भर
निर्मलता नीलाम हो गई
घेर अंधेर मचाए बादल!
-बौराए बादल
उनकी कवि‍ताओं में दर्ज ऐसे समस्‍त दृश्‍य एक अर्थ में सांसारि‍क वि‍धानों की आलोचना ही है। एक भावयि‍त्री प्रति‍भा द्वारा जुटाई हुई सर्वेक्षण-सूची।
समीक्षकों ने उन्‍हें तरह-तरह के वि‍शेषण दि‍ए। कि‍सी ने महाप्राण नि‍राला का अन्‍यतम उत्तराधि‍कारी माना; कि‍सी ने छायावाद का पंचम स्‍तम्‍भ, तो कि‍सी ने छायावदोत्तरकाल के मुखरतम वातावरण का सर्वथा भि‍न्‍न स्‍वर। यह उनकी वि‍लक्षण प्रति‍भा और रचनात्‍मक नि‍ष्‍ठा ही है कि‍ इनमें से कोई एक वि‍शेषण पूरे जानकीवल्लभ को नहीं समेट पाता। बहरहाल, उनमें एक वि‍शेषण और जोड़े जाने चाहि‍ए। हि‍न्‍दी में तुलनात्‍मक साहि‍त्‍य के सम्‍भवत: वे पहले आचार्य हैं, जि‍नकी तुलन-दृष्‍टि‍ का समुचि‍त लाभ आज तक के अध्‍येता नहीं ले पाए। तुलनात्मक-साहित्य के वि‍रले ही कि‍सी भारतीय चि‍न्‍तक ने लक्ष्‍य कि‍या हो कि‍ साहि‍त्‍य-दर्शन संकलन के तेइस में से चौदह नि‍बन्‍ध भारतीय तुलनात्‍मक अध्‍ययन के स्वरूप नि‍र्धारि‍त करते हैं। तुलनात्मक-साहित्य (कम्पैरेटिव लिटरेचर) ज्ञान की एक महत्त्‍वपूर्ण शाखा है। स्वतन्त्र अनुशासन के रूप में इसका वि‍कास उन्‍नीसवी शताब्‍दी के अन्‍ति‍म चरण में हुआ और विभिन्न विश्वविद्यालयों में इसके अध्ययन-अध्यापन को महत्त्‍व दिया जाने लगा। सन् 1848 में अंग्रेजी के कवि मैथ्यू आर्नल्ड ने सबसे पहले कम्पैरेटिव लिटरेचर पद का प्रयोग किया। भारत में सन् 1907 में रवीन्द्रनाथ टैगोर ने विश्व-साहित्य का उल्लेख करते हुए साहित्य के अध्ययन में तुलनात्मक-दृष्टि की आवश्यकता पर बल दिया। दो पाठों के भाव-संवेदनाएँ-विचार-कला-सन्‍दर्भ के साम्‍य-वैषम्‍य का अनुशीलन तुलनात्मक-साहित्य का लक्ष्‍य होता है। 
अन्‍तर्राष्‍ट्रीय स्‍तर पर तुलनात्‍मक अध्‍ययन के तीन स्‍कूल-- फ्रेंच स्कूल, अमेरिकी स्कूल, जर्मन स्कूल-- माने जाते हैं। इस ज्ञानशाखा के स्वरूप एवं मानदण्ड निर्धारित करने में पीटर स्जो़ण्डी (सन् 1929-1971), जाक देरीदा (सन् 1930-2004), पियरे बौरदिए (सन् 1930-2002), लूसिए गोल्डमान (सन् 1930-1982), पॉल डी मान (सन् 1919-1983), जरशॉम शॉलम (सन् 1897-1982), थियोडोर अडोर्नो (सन् 1903-1969) जैसे विद्वानों की बड़ी भूमि‍का है। प्रारम्भ में तुलनात्मक-साहित्य को सहित्येतिहास की एक शाखा माननेवाले फ्रांसीसी चिन्तकों को बाद में प्रतीत हुआ कि इससे तुलनात्मक-साहित्य का सम्मानित स्वरूप आहत और साहित्य का सौन्दर्यमूलक पक्ष बेमानी हो जाएगा। फलस्‍वरूप व्यावहारिक और ठोस आलोचनात्मक दृष्टि की सहायता से उनलोगों ने साम्य-वैषम्य की तुलना और प्रभाव के सूत्रों के साथ अनुशीलन की संश्लेषणात्मक दृष्टि विकसित की। जबकि अमेरि‍की सम्प्रदाय की नजर में साहित्येतिहास की सामान्य संरचना के अन्तर्गत तुलनात्मक-साहित्य को ज्ञान की अन्य शाखाओं के साथ प्रदत्त पाठ के सम्बन्ध-बन्ध का अनुशीलन माना गया और साहित्यालोचन को तुलनात्मक-साहित्य के एक महत्त्वपूर्ण अंग के रूप में स्वीकारा गया।
भारत में रवीन्द्रनाथ टैगोर (सन् 1861-1941) से पहले बंकि‍मचन्‍द्र चट्टोपाध्‍याय (सन् 1838-1894) शकुन्तला, मिराण्‍डा एवं डेस्डिमोना शीर्षक नि‍बन्‍ध में भारतीय तुलनात्मक दृष्टि का परि‍चय दे चुके थे। उल्‍लेखनीय है कि‍ जि‍न दि‍नों यूरोप में जाक देरीदा, पियरे बौरदिए, लूसिए गोल्डमान, पॉल डी मान, जरशॉम शॉलम, थियोडोर अडोर्नो जैसे विद्वानों का व्‍याख्‍यान आयोजि‍त करवाकर पीटर स्जो़ण्डी (सन् 1929-1971) जर्मन तुलनात्‍मक साहित्य का स्वरूप एवं मानदण्ड निर्धारित करने में लगे थे, उससे कई वर्ष पूर्व आचार्य जानकीवल्‍लभ शास्‍त्री 'मुद्राराक्षस और जूलि‍यस सीजर' का तुलनात्‍मक अध्‍ययन प्रस्‍तुत कर चुके थे। दो पाठों के भाव, संवेदनाएँ, विचार, कला, सन्‍दर्भ के साम्‍य-वैषम्‍य का अनुशीलन प्रस्‍तुत कर चुके थे। उनके तुलनात्‍मक अध्‍ययन का कौशल रोमांचक और प्रेरणास्‍पद है। मीरा-महादेवी, मुद्राराक्षस-जूलि‍यस सीजर, दिंग्‍नाग-कालि‍दास, कालि‍दास-तुलसीदास, जयदेव-वि‍द्यापति‍, गीता-गीतांजलि‍, भक्‍ति‍-शृंगार, साहि‍त्‍य-राजनीति‍, साहि‍त्‍य-दर्शन... जैसे वि‍षयों पर प्रस्‍तुत उनके वि‍लक्षण तुलनात्‍मक-दृष्‍टि‍ की तात्त्‍वि‍क समीक्षा अभी तक नहीं की जा सकी है। उनके द्वारा हि‍न्‍दी में संस्‍थापि‍त तुलनात्‍मक-साहि‍त्‍य की नींव का संज्ञान अभी तक कि‍सी भारतीय वि‍द्वानों ने नहीं लि‍या है। जबकि‍ भारतीय-साहि‍त्‍य, अनुवाद-अध्‍ययन, और तुलनात्‍मक-साहि‍त्‍य में जुटे हर अध्‍येता के लि‍ए शोध एवं आलोचना की दृष्‍टि‍ से आचार्य जानकीवल्‍लभ शास्‍त्री कृत साहि‍त्‍य-दर्शन एक अनि‍वार्य पुस्‍तक है। तुलनात्‍मक -साहि‍त्‍य से सम्‍बद्ध इस संकलन के चौदहो आलेख तो 'हि‍न्‍दी तुलनात्‍मक-साहि‍त्‍य' के आरम्‍भि‍क शास्‍त्र के रूप में देखा जाना चाहि‍ए। आचार्य शास्‍त्री ने इनमें जि‍न तुलनात्‍मक-वि‍धानों का उपयोग कि‍या है, वे चकि‍त करते हैं। जि‍न दि‍नों (सन् 1936-1941‍ के बीच) ये आलेख लि‍खे गए, भारतीय साहि‍त्‍य-धारा में इस पदबन्‍ध के नाम लेनेवाले भी गि‍नती के ही थे। तुलनात्‍मक-अध्‍ययन का कोई स्‍पष्‍ट वि‍धि-वि‍धान नि‍र्धारि‍त नहीं हुआ था। दुनि‍या के अन्‍य देशों के वि‍द्वान भी इसका स्‍वरूप तय ही कर रहे थे। 
वि‍शाखदत्त-शेक्‍सपि‍यर और कालि‍दास-तुलसीदास की तुलना करते हुए उन्‍होंने जि‍स तरह अपने इति‍हास-बोध, समाज-बोध, साहि‍त्‍य-बोध, मानवीयता और जीवन-दृष्‍टि का परि‍चय दि‍‍या है, वह वि‍लक्षण तो है ही, आज के आलोचकों के लि‍ए अनुकरणीय भी है। आलोचना एवं तुलना के उनके हर सूत्र जनजीवन की सहजता, मानवीयता, समाज और राष्‍ट्र की हि‍त-चि‍न्‍ता से सम्‍बद्ध होते हैं। वि‍दि‍त है कि‍ वि‍शाखदत्त रचि‍त मुद्राराक्षस सुखान्‍त और शेक्‍सपि‍यर रचि‍त जूलि‍यस सीजर दुखान्‍त कृति‍ है। ऐति‍हासि‍क पृष्‍ठभूमि के साथ दोनो राजनीति‍क नाटक हैं, दोनो में कई समानताएँ हैं। इसके बावजूद दोनो के रसास्‍वादन में अन्‍तर है, और इस अन्‍तर का कारण आचार्य शास्‍त्री उनका सुखान्‍त-दुखान्‍त होना नहीं मानते। उन्‍होंने तीनो नाट्य-तत्त्‍व---वस्‍तु, नेता, रस---पर सूक्ष्‍मता से वि‍चार कि‍या है। उन्‍हें राक्षस के आगे ब्रूटस और चाणक्‍य के आगे कैसि‍यस फीके नजर आते हैं। वे पात्रों के आचरण के आधार पर उसकी मानवीयता की भी परख करते हैं, उसका मूल्‍यांकन वे नैति‍कता के साँचे में करते हैं। उन्‍हें कैसि‍यस कुटि‍ल और अनैति‍क लगता है, क्‍योंकि‍ वह मि‍त्र के साथ प्रपंच करता है; कैसि‍यस को आचार्य जानकीवल्‍लभ शास्‍त्री श्रेष्‍ठ कोटि‍ के राजनीति‍ज्ञ मानने को तैयार नहीं हैं। उन्‍हें उस नाटक की आत्‍मा खण्‍डि‍त दि‍खती है। राजनीति इस नाटक की आत्‍मा है, और उस राजनीति‍ के आचार्य कैसि‍यस अनैति‍कता के सम्‍पोषक, तो रचना की आत्‍मा खण्‍डि‍त होना स्‍वाभावि‍क है।‍ वे कहते हैं--''जनता की मनोवृत्ति‍ का, देश की गति‍वि‍धि‍ का, वि‍श्‍व की परि‍स्‍थि‍ति‍ का--संक्षेप में देशकाल का भी जि‍से सम्‍यक् ज्ञान नहीं; अच्‍छी पहचान नहीं; उसे उच्‍च कोटि‍ का राजनीति‍ज्ञ कैसे कहा जा सकता है?''[8] इस आलोचकीय दृष्‍टि‍ को शतस: नमन!
इसके प्रति‍कूल उन्‍हें कूटनीति‍ में पारंगत होते हुए भी चाणक्‍य कहीं खूँखार नहीं दि‍खते; शत्रु तक के साथ अनैति‍क आचरण करते नहीं दि‍खते; चाणक्‍य की नैति‍कता ही उन्‍हें उनकी सफलताओं की कुँजी लगती है। वे कहते हैं--''वैराग्‍य, नि‍र्लोभता, प्रशान्‍ति‍ आदि‍ भाव वि‍शेषकर भारत के ही हो सकते हैं, भारत का राजनीति‍ज्ञ भी इतना बड़ा तपस्‍वी होता है।''[9] इसी तरह वे ब्रूटस और राक्षस की तुलना करते हैं। ब्रूटस के उज्‍ज्‍वल, उन्‍नत, पवि‍त्र जीवन के बावजूद अपने परम वि‍श्‍वासी मि‍त्र जूलि‍यस की हत्‍या कर देने के कारण वे उसका सर्वनाश तय मानते हैं। जबकि‍ राक्षस को वे उससे उन्‍नत मानते हैं। उसके आत्‍मसमर्पण को श्रेष्‍ठ मानते हैं। वे मानते हैं कि‍ ''सर्वस्‍वत्‍यागी चाणक्‍य से प्राणत्‍यागी कैसि‍यस का या आत्‍मसमर्पणकारी राक्षस से आत्‍महत्‍याकारी ब्रूटस का ठीक-ठीक मुकाबला नहीं हो सकता।''[10]
मार्च 1936 में जानकीवल्‍लभ शास्‍त्री अपने लेख 'कालि‍दास और तुलसीदास का शृंगारवर्णन (प्रति‍वाद)' में लि‍खते हैं कि‍ ''कवि‍कुलगुरु कालि‍दास तथा भक्‍तशि‍रोमणि‍ तुलसीदास के शृंगार-वैचि‍त्र्य के वि‍षय में एक तुलनात्‍मक आलोचना 'माधुरी' के गत अंक में प्रकाशि‍त हो चुकी है।...अश्‍लीलता की दुहाई देनेवाले के लि‍ए कालि‍दास से तुलसीदास की तुलना करना गलत है। कारण, कालि‍दास ने शृंगारप्रधान काव्‍य लि‍खे हैं और तुलसीदास ने भक्‍ति‍प्रधान।...मेघदूत का यक्ष और शकुन्‍तला का दुष्‍यन्‍त मर्यादापुरुषोत्तम नहीं; वे सांसारि‍क हैं, अतएव सांसारि‍क चि‍त्रण उनके चरि‍त्र की स्‍वाभावि‍कता के लि‍ए उतना ही आवश्‍यक हैं जि‍तना मर्यादापुरुषोत्तम की मर्यादि‍त भावनाओं की परि‍पुष्‍टि‍ के लि‍ए अलौकि‍क या असांसारि‍क चि‍त्रण।...कालि‍दास केवल आदर्शवादी न थे, फि‍र भी उनकी कला आदर्श से सूनी नहीं है।...तुलसीदास ने शृंगार का वर्णन वि‍स्‍तृत रूप में नहीं कि‍या, यह कोई वि‍शि‍ष्‍ट आदर्श नहीं है। वाल्‍मीकि‍ की यथार्थवादि‍ता तुलसीदास से उनकी न्‍यून प्रति‍भा होने का परि‍चय नहीं देती। सीता के स्‍तन में चोंच मारने की बात वाल्‍मीकि में भी बतलाई गई है। भक्‍त होने के कारण तुलसीदास उसे टाल गए तो इसके मानी यह नहीं कि‍ वाल्‍मीकि‍ या कालि‍दास की दृष्‍टि‍ शृंगारि‍क है। भक्‍ति‍ और कवि‍ता भि‍न्‍न-भि‍न्‍न वस्‍तु हैं। मुख का वर्णन करते समय भक्‍तकवि‍ की दृष्‍टि‍ चरणों पर ही कैसे रहेगी?''[11] इन तर्कों के सहारे जानकीवल्‍लभ शास्‍त्री कहीं कि‍सी रचनाकार के उखाड़-ति‍रस्‍कार की बात नहीं की। उनकी साफ मान्‍यता है कि‍ प्रसि‍द्धि‍ के लि‍हाज से तुलसीदास कालि‍दास से तनि‍क भी कम नहीं, बल्‍कि‍ भक्‍त की दृष्‍टि‍ से बढ़कर भी हैं; पर इसके मानी यह नहीं कि‍ कवि‍त्‍व-कला के सूक्ष्‍म पर्यवेक्षणावसर पर वे कालि‍दास से बढ़कर हैं।[12] उनका तर्क है कि‍ कि‍सी श्रेष्‍ठ कलाकार का चरम उद्देश्‍य केवल चरि‍त्रगान करना नहीं होता। शृंगारवर्णन मात्र से कोई रचना असंयत और आदर्श-चि‍त्रण मात्र से कोई रचना संयत नहीं हो जाती। ऐसी राय बनाना कि‍सी चि‍न्‍तक के असंयम का द्योतक होगा। तुलसीदास की दृष्‍टि‍ नि‍श्‍चय ही सदैव आदर्श-चि‍त्रण की ओर रहती थी, पर इस कारण कालि‍दास के आदर्श को कम स्‍वच्‍छ नहीं कहा जा सकता। तुलना करते समय वि‍वेकशील दृष्‍टि‍ से पाठ की परख अत्‍यन्‍त प्रयोजनीय होती है। कालि‍दास के नायक दुष्‍यन्‍त एक राजा हैं, पूर्ण वयस्‍क, अनेक रानि‍यों के राजा, समस्‍त राजकीय भोग के अनुभवी; जबकि‍ तुलसीदास के नायक राम जनक की पुष्‍पवाटि‍का में एक कि‍शोर हैं, ब्रह्मचर्य व्रत का पालन करते हुए आए एक कुमार। इसलि‍ए समस्‍त सांसारि‍क अनुभवों से अवगत दुष्‍यन्‍त का शृंगारि‍क भाव ब्रह्मचर्यव्रतधारी राम के शृंगारि‍क भाव से नि‍श्‍चय ही भि‍न्‍न होगा।[13] 'माधुरी', जुलाई 1937 में आचार्य दिंग्‍नाग और कवि‍ कालि‍दास शीर्षक उनके तुलनात्‍मक लेख पर वि‍द्यावयोवृद्ध सेठ कन्‍हैयालाल जी पोद्दार ने जब उनके ज्ञान को चुनौती दी तो उस पर भी उन्‍होंने बड़ी ही शालीनता से कि‍न्‍तु व्‍यंग्‍यात्‍मक भाषा में जवाब दि‍या।[14]
खण्‍डन-मण्‍डन की ये प्रक्रि‍याएँ तो जीवन-वि‍धान के हर क्षेत्र में सदैव चलती रही हैं, खण्‍डन करनेवाले वे वि‍द्वान सम्‍भवत: उस दौर में यह अनुमान नहीं कर पाए होंगे कि‍ आगामी कुछ दशकों में आचार्य जानकीवल्‍लभ शास्‍त्री का यह तुलनात्‍मक-अध्‍ययन ज्ञान की एक नई शाखा का रूप लेगा, जो दुनि‍या के उन्‍नत कहे जानेवाले राष्‍ट्रों के वि‍द्वानों की तुलनात्‍मक-दृष्‍टि‍ को भी चुनौती देगा। तथ्‍यत: तुलनात्‍मक-साहि‍त्‍य के क्षेत्र में आचार्य जानकीवल्‍लभ शास्‍त्री द्वारा शुरू कि‍या गया प्रयास हि‍न्‍दी के लि‍ए तो नींव का पत्‍थर है ही, इस ज्ञान-शाखा के वि‍शेषज्ञ चाहें तो उनके इन नि‍बन्‍धों में छि‍पी वि‍लक्षण तुलनात्‍मक-दृष्‍टि‍ के सूक्ष्‍म सूत्र भी तलाश सकते हैं। उनकी तुलनात्‍मक-दृष्‍टि स्‍थान-काल-पात्र, इति‍हास-परि‍वेश‍-समाज की सूक्ष्‍मताओं को देखते हुए ही आगे बढ़ती है। भारतीय तुलनात्‍मक-अध्‍ययन को सम्‍पुष्‍ट करने हेतु उन सूक्ष्‍मताओं को गम्‍भीरता से पहचानने और उसे वि‍स्‍तार देने की बड़ी जरूरत है।




[1].  साहि‍त्‍य-दर्शन/कि‍ताबघर/2012/पृ. 73
[2].  गौरतलब है कि यह हजारीप्रसाद द्वि‍वेदी के बहुचर्चि‍त ललि‍त नि‍बन्‍ध का शीर्षक है।  
[3].  उल्‍लेखनीय है कि‍ आचार्य जानकीवल्‍लभ शास्‍त्री ने अपनी कृति‍ साहि‍त्‍य-दर्शन (पृ. 9) में व्‍यंग्‍यार्थ उत्‍पन्‍न करने हेतु यह उद्धरण आचार्य हजारीप्रसाद द्वि‍वेदी नि‍बन्‍ध 'हम क्‍या करें?' के 'साहि‍त्‍य-सेवा का अधि‍कार सभी को है!' उपशीर्षक से लि‍या है। सन् 2007 में राजकमल प्रकाशन द्वारा प्रकाशि‍त कृति‍ कल्‍पलता के चौदहवें संस्‍करण में पृ. 132 पर इसे देखा जा सकता है। ‍
[4].  नन्‍ददुलारे वाजपेयी की कृति‍
[5]. नन्‍ददुलारे वाजपेयी की कृति‍
[6].  आचार्य जानकीवल्‍लभ शास्‍त्री/साहि‍त्‍य-दर्शन/कि‍ताबघर प्रकाशन/2012/पृ. 9
[7].  साहि‍त्‍य-दर्शन/कि‍ताबघर/पृ. 73-74/सं. 2012
[8] . मुद्राराक्षस और जूलि‍यस सीजर'/ साहि‍त्‍य-दर्शन/कि‍ताबघर/सं.2012/पृ. 123-24    
[9].  मुद्राराक्षस और जूलि‍यस सीजर'/ साहि‍त्‍य-दर्शन/कि‍ताबघर/सं.2012/पृ. 25
[10].  मुद्राराक्षस और जूलि‍यस सीजर'/ साहि‍त्‍य-दर्शन/कि‍ताबघर/सं.2012/पृ. 126
[11].  साहि‍त्‍य-दर्शन/कि‍ताबघर/सं.2012/पृ. 130-32
[12].  साहि‍त्‍य-दर्शन/कि‍ताबघर/सं.2012/पृ. 130
[13].  साहि‍त्‍य-दर्शन/कि‍ताबघर/सं.2012/पृ. 132-33
[14].  साहि‍त्‍य-दर्शन/कि‍ताबघर/सं.2012/पृ. 127

Thursday, September 8, 2016

भारतीय साहि‍त्य के मैथि‍ल सम्पोषक




हि‍स्‍से से अधि‍क पाने की ललक सभ्‍यता के शुरुआती दि‍नों से ही मनुष्‍य पर सवार रही है। इस सहज-वृत्ति‍ की परि‍पूर्ति‍ में कि‍सि‍म-कि‍सि‍म के हथकण्‍डे लोग सदैव अपनाते आए हैं। साहि‍त्‍यि‍क बि‍रादरी में इसकी गुंजाइश साहि‍त्‍येति‍हास-लेखन के प्रारम्‍भि‍क दौर में ही बन गई थी। मान्‍यतादाता महाजनों की कृपा-दृष्‍टि‍ जि‍न पर हुई, वे इति‍हास में दर्ज हो गए, जो रह गए, वे रह गए। 'समय का देवता' होने की ललक में कुछ साहि‍त्‍यि‍कों ने प्रगति‍शील आन्‍दोलन के बाद से ही खेमेबाजी शुरू कर दी। प्रयोगवाद से नई कवि‍ता तक अथवा नई कहानी से समान्‍तर कहानी, सचेतन कहानी तक की घोषणा में इस वृत्ति‍ की तलाश की सकती है। इधर आकर तो कुछ हद ही हो गई। सारी नीति‍-नि‍ष्‍ठा ताख पर रखकर लोग महान बनने की होड़ में जुट गए। कद बढ़ाने के चरम लक्ष्‍य में दूसरों के कन्‍धे बैठना, ऊँचा दि‍खने के लि‍ए दूसरों को लँगड़ी मारकर मुँह के बल गि‍राना, अपनी महत्ता के प्रचार एवं औरों के दुष्‍प्रचार में लि‍प्‍त रहना, दि‍वंगत रचनाकारों का कल्‍पि‍त संस्‍मरण लि‍खकर खुद को महि‍मामण्‍डि‍त करना वे अपने जीवन का महत्तम उद्देश्‍य समझने लगे हैं। उन्‍हें न तो अपने कृति‍कर्मों पर आस्‍था है, न इति‍हास की न्‍यायप्रि‍यता का बोध। उन्‍हें नहीं मालूम कि‍ कृति‍कार स्‍वयं अपने लि‍ए कीर्ति-स्‍तम्‍भ नहीं बनाते। दानवीय क्षमता से ध्‍वज-स्‍तम्‍भ गाड़नेवाले अंग्रेजों की दशा देखकर भी उन्‍हें होश नहीं होता, तो फि‍र उनकी इस छुद्र लि‍प्‍सा पर हतप्रभ होना भी जायज नहीं है। वि‍गत सौ-सवा सौ बरसों में लोगों ने हि‍स्‍से से अधि‍क पाने हेतु एक से एक तरकीबें अपनाई हैं। इन तरकीबों में नए-नए प्रयोग हुए हैं। आत्‍म-स्‍थापन और आत्‍म-प्रचार की धारणा से आक्रान्‍त इधर के बौद्धि‍क-जन जैसे-जैसे अमानुषि‍क आचरणों में लि‍प्‍त हुए, वैसा कभी साम्राज्‍य-वि‍स्‍तार के कि‍सी आखेटकों ने भी बीते वर्षों में न कि‍या होगा। उनके आचरण से उनके लक्ष्‍य की उपादेयता सन्‍देहास्‍पद होने लगी है। बहरहाल, यहाँ राष्‍ट्रभाषा हि‍न्दी में मैथि‍ल रचनाकारों के अवदान की बात होनी है।
हम भली-भाँति‍ अवगत हैं कि‍ सन् 1941-1959 तक के दौर के रूढ़ि‍-समर्थकों और आधुनि‍कतावादि‍यों के किंचि‍त आक्षेप-प्रत्‍याक्षेप के अलावा ज्‍योति‍रीश्‍वर-काल से राजकमल-काल तक के मैथि‍ली रचनाकारों की धारणा में कहीं कुछ कलुष जैसा नहीं दि‍खता, सारा कुछ पवि‍त्र ही दि‍खता है। सभी रचनाधर्मी मातृभाषा के उत्‍थान-उत्‍कर्ष में लि‍प्त-तृप्‍त दि‍खते हैं। उनकी रचना-धारा में नैष्‍ठि‍क भाषा-प्रेम की धारणा प्रवहमान दि‍खती है। हर पीढ़ी के रचनाकारों में अपने साहि‍त्‍य को समकालीन और शाश्‍वत बनाने की भरपूर रचनात्‍मक लि‍प्‍सा दि‍खती है। मैथि‍ली साहि‍त्‍य को समकालीन और उर्ध्‍वमुखी बनाने, वि‍श्‍व-फलक पर अपनी ऊर्जस्‍वि‍त रचना-दृष्‍टि‍ एवं राष्‍ट्रवादी धारणाओं का परि‍चय देने में सीताराम झा, कांचीनाथ झा कि‍रण, रामकृष्‍ण झा कि‍सुन, वैद्यनाथ मि‍श्र यात्री, ललि‍त, राजकमल, मायानन्‍द, सोमदेव, हंसराज, प्रभास कुमार चौधरी, गंगेश गुंजन, मन्‍त्रेश्‍वर झा, जीवकान्त, महाप्रकाश, सुकान्‍त सोम इत्‍यादि‍ की एकनि‍ष्‍ठ भावनाओं का संज्ञान लि‍या जा सकता है। कि‍न्‍तु बाद की समागत पीढ़ी में 'समय का देवता' बनने की हि‍न्‍दी साहि‍त्‍य वाली रणनीति‍ इस तरह समाई कि‍ वे अपने रचनात्‍मक सरोकार भूलकर खेमेबाजी में लीन हो गए। पूर्ववर्ती पीढ़ि‍यों की रूढ़ि‍प्रि‍यता और स्‍वार्थ-नीति‍ की नि‍न्‍दा करते-करते स्‍वार्थ के कुएँ में खुद इस तरह डूबे कि‍ आत्‍मवर्चस्‍व और नि‍जगि‍रोह की प्रशंसा के अलावा उन्‍हें और कुछ दि‍खता ही नहीं। अगली पीढ़ि‍याँ भी अपने इन पूर्ववर्ति‍यों के आचरण की नकल करती हुई उत्‍साहपूर्वक उद्दण्‍डता की ओर बढ़ चली। उनकी समग्र ऊर्जा पूर्ववति‍यों की भर्त्‍स्‍ना में खपने लगी। इक्‍कीसवीं शताब्‍दी की शुरुआत में मैथि‍ली को संवि‍धान में स्‍वीकृति‍ तो मि‍ली, कि‍न्‍तु नवागत पीढ़ी को बीसवीं शताब्‍दी के अन्‍ति‍म चरण से ऐसी दि‍ग्‍भ्रान्‍त प्रेरणा मि‍ली कि‍ उनका मूल उद्देश्‍य बेहतर साहि‍त्‍य पढ़ना और बेहतर लि‍खना नहीं रह गया; नि‍जभाषा एवं साहि‍त्‍य की मूल-वृत्ति‍ को उत्‍कर्ष की ओर ले जाने का कोई उत्‍साह उन्‍हें नहीं है। अध्‍यवसायवि‍हीन इन पीढ़यों के लोगों की आकांक्षा है कि‍ वे जो कुछ कर रहे हैं, उसे महान कृत्‍य माना जाए, उस पर कोई सवाल न हो। अब वे साहि‍त्‍य के लि‍ए नहीं; मान्‍यता, वर्चस्‍व, प्रचार और पुरस्‍कार के लि‍ए लि‍खते हैं। मैथि‍ली में पुरस्‍कारों का वैसे भी नि‍तान्‍त अभाव है, लि‍हाजा छवि‍भंग करने की हिंस्र वृत्ति‍ अपनाना उनकी मजबूरी है। कि‍न्‍तु बात होनी है हि‍न्‍दी-लेखन में मैथि‍ल रचनाकारों के अवदान की।
उल्‍लेख हो चुका है कि‍ श्रेय-हरण, सुनि‍योजित उपेक्षा और दूसरे के हि‍स्‍सों में दखल‍ की नीति‍ हि‍न्‍दी साहि‍त्‍येति‍हास-लेखन में प्रारम्‍भि‍क दौर से लागू थी। छोटे पैमाने पर उस नीति‍ का शि‍कार मैथि‍ली बीसवीं शताब्‍दी की शुरुआत से ही होने लगी। महाकवि‍ वि‍द्यापति‍ के रास्‍ते मैथि‍ली पर कब्‍जा करने का हि‍न्‍दी के साहि‍त्‍येति‍‍हासकारों का वह प्रारम्‍भि‍क प्रयास था। उनसे दो-तीन दशक पूर्व महान राष्‍ट्रवादी मैथि‍ल रचनाकार कवीश्‍वर चन्‍दा झा सन् 1881 में ही वि‍द्यापति‍ रचि‍त 'पुरुष परीक्षा' के अपने मैथि‍ली अनुवाद की भूमि‍का हि‍न्‍दी में लि‍खकर अपनी उदारता का परि‍चय दे चुके थे।[1] उन्‍होंने हि‍न्‍दी में मूल-लेखन भी पर्याप्‍त कि‍या। हि‍न्‍दी के अनुसन्‍धानवेत्ता उस ओर दृष्‍टि‍ फि‍राएँ तो नि‍श्‍चय ही चकि‍त होंगे। सन् 1857 के गदर में भारतीय सेनानि‍यों की पराजय और सन् 1947 में मि‍ली आजादी के नब्‍बे वर्षों के भारतीय साहि‍त्‍यकारों के रचनात्‍मक सन्‍धान पर गम्‍भीरता से वि‍चार करने की आवश्‍यकता है। भाषाई वर्गीयता तो बाद के सत्तानुरागि‍यों की सि‍यासी चतुराई है! 'नि‍जभाषा उन्‍नति अहै सब उन्‍नति‍ कौ मूल‍' का नारा भारतेन्‍दु हरि‍श्‍चन्‍द्र ने यूँ ही नहीं दे दि‍या था। उसके पीछे सोची-समझी नीति‍ थी। प्रथम स्‍वाधीनता संग्राम (सन् 1857) में भारतीय सेनानि‍यों की पराजय से भारतीय बौद्धि‍कों ने दि‍व्‍य-ज्ञान हासि‍ल कि‍या था। उन्‍हें अलग-अलग कारणों से उपजे वि‍रोध-भाव में सांगठनि‍क दुर्बलता स्‍पष्‍ट दि‍ख गई थी। गौर करें कि‍ 'नि‍जभाषा' का अभि‍प्राय हि‍न्‍दी नहीं, मातृभाषा है। हि‍न्‍दी कि‍सी क्षेत्र की मातृभाषा नहीं है। मातृभाषा केवल अभि‍व्‍यक्‍ति‍ का माध्‍यम नहीं, जनपदीय संस्‍कृति‍ का अनुरक्षण केन्‍द्र भी है। उसमें राष्‍ट्र की क्षेत्रीय अस्‍मि‍ता सुरक्षि‍त होती है। सम्‍पूर्ण ध्‍वन्‍यार्थ समझकर ही हि‍न्‍दी नवजागरण के अग्रदूत भारतेन्‍दु हरि‍श्‍चन्‍द्र ने वह नारा दि‍या होगा। इस दि‍शा में अन्‍य भारतीय भाषाओं के रचनाकारों के योगदान पर भी शोध-दृष्‍टि‍ डाली जा सकती है, कि‍न्‍तु परम राष्‍ट्रवादी मैथि‍ल रचनाकार कवीश्‍वर चन्‍दा झा का अवदान स्‍पष्‍ट है कि‍ सन् 1881 में उन्‍होंने महाकवि वि‍द्यापति‍ की प्रसि‍द्ध कृति‍ 'पुरुष परीक्षा' का अनुवाद तो कि‍या मैथि‍ली में, कि‍न्‍तु उसकी भूमि‍का लि‍खी हि‍न्‍दी में। स्‍वाधीनता-संग्राम के दि‍नों में उस अनुवाद की महत्ता तो अलग से वि‍वेच्‍य है, पर मैथि‍ली अनुवाद की पुस्‍तक की हि‍न्‍दी में लि‍खि‍त वह भूमि‍का वि‍शेष रूप से उल्‍लेखनीय थी। फि‍र भी हि‍न्‍दी के साहि‍त्‍येति‍हासकारों ने मैथि‍ल रचनाकार की इन राष्‍ट्रीय भावनाओं की सुधि‍ नहीं ली।‍ स्‍वातन्‍त्र्योत्तरकालीन भारत में भी मैथि‍ली को अवहेलना का गहरा अवसाद झेलना पड़ा। स्‍वाधीनता-आन्‍दोलन के दौरान पूरे देश का बौद्धि‍क समुदाय अपनी सारी वृत्ति‍याँ कि‍नारे रखकर राष्‍ट्रीय भावना से गदर में कूद पड़े थे। मि‍थि‍लांचल के बौद्धि‍कों ने भी उसमें बढ़-चढ़कर योगदान दि‍या। अपनी समस्‍त क्षेत्रीय कामनाओं का परि‍त्‍याग कर राष्‍ट्रभक्‍ति‍ की भावनाओं से भरे मैथि‍ल बुद्धि‍जीवि‍यों ने स्‍वाधीनता-संग्राम में अपना सुर मि‍लाया। कवीश्‍वर चन्‍दा झा, छेदी झा द्वि‍जवर, यदुनाथ झा यदुवर, सुरेन्‍द्र झा सुमन, आरसी प्रसाद सिंह, वैद्यनाथ मि‍श्र यात्री, राजकमल चौधरी आदि‍ के नाम इस दि‍शा में श्रद्धा से लि‍ए जाएँगे। यात्री और राजकमल के हि‍न्‍दी-लेखन का संज्ञान तो हि‍न्‍दीवालों को मजबूरीवश देर-सबेर लेना पड़ा; क्‍योंकि‍ इनके बि‍ना उनकी आधुनि‍कता खतरे में पड़ जाती। समुचि‍त नहीं, कम ही सही, पर आरसी प्रसाद सिंह को भी कुछ-कुछ जानने की रस्‍मअदायगी लोगों ने की। पर, कवीश्‍वर चन्‍दा झा, छेदी झा द्वि‍जवर, यदुनाथ झा यदुवर, सुरेन्‍द्र झा सुमन, सुधांशु शेखर चौधरी, रामकृष्ण झा किसुन जैसे रचनाकारों का बि‍पुल हि‍न्‍दी-लेखन आज तक आम-पाठकों, शोधवेत्ताओं और नामवर आलोचकों की दृष्‍टि‍ से ओझल ही है।
फणीश्‍वरनाथ रेणु, वैद्यनाथ मि‍श्र यात्री (नागार्जुन), राजकमल चौधरी को भी उन्‍होंने मजबूरी में ही स्‍वीकार कि‍या। नहीं स्‍वीकारते तो बड़ी उपलब्‍धि‍ की धारा में शामि‍ल होने से रह जाते। आरसी प्रसाद सिंह और मायानन्‍द मि‍श्र को तो सही ढंग से स्‍वीकारा भी नहीं। सन् 1942 के आन्‍दोलन से लेकर आपातकाल, इन्‍दि‍रा गाँधी की हत्‍या, मन्‍दि‍र-मस्‍जि‍द वि‍वाद और राजीव गाँधी की हत्‍या तक की स्‍थि‍ति‍यों पर आरसी प्रसाद सिंह की राष्‍ट्रवादी एवं मनवतावादी रचनाएँ उस पूरे दौर की अनूठी और दुर्लभ उपलब्‍धि‍याँ हैं। परम राष्‍ट्रवादी कवि, कथाकार और एकांकीकार आरसी प्रसाद सिंह (सन् 1911-1996) को जीवन, यौवन, रूप, रस  और प्रेम के कवि के रूप में स्‍मरण कि‍या जाता है। चर्चि‍त मैथि‍ली कृति‍ सूर्यमुखी के लि‍ए उन्‍हें साहित्य अकादेमी सम्‍मान से सम्‍मानि‍त कि‍या गया। मैथि‍‍ली में प्रकाशि‍त उनकी अन्‍य कृति‍याँ-- माटिक दीप, पूजाक फूल, मेघदूत आदि‍ हैं। मातृभाषा मैथि‍ली के साथ-साथ उन्‍होंने राष्‍ट्रभाषा हिन्दी के साहित्य का कोश प्रचुरता से सम्‍पन्‍न कि‍या। 'युवक' (सम्‍पा. रामवृक्ष बेनीपुरी) में प्रकाशित उनकी रचनाएँ उनकी राजनीतिक जागरूकता एवं निर्भीकता के प्रमाण हैं। उन रचनाओं में प्रयुक्‍त क्रान्‍तिकारी शब्दों के कारण ब्रि‍टि‍श हुकूमत ने उनके वि‍रुद्ध गिरफ्तारी का वारण्‍ट भी जारी कि‍या था। हिन्दी में प्रकाशि‍त उनकी कवि‍ताओं, कहानि‍यों, कथाकाव्‍यों, गीतों, बाल-कवि‍ताओं क लगभग तीन दर्जन प्रकाशि‍त पुस्‍तकों के अति‍रि‍क्‍त मैथि‍ली, हि‍न्‍दी मि‍लाकर डेढ़ दर्जन से अधि‍क पुस्‍तकों की पाण्‍डुलि‍पि‍ अभी भी अप्रकाशि‍त हैं। राष्‍ट्रभक्‍ति‍ और मानवीयता उनकी रचनाधर्मि‍ता का मूल स्‍वर था। जीवन और यौवन के प्रति‍ उनके उल्‍लासमय स्‍वर इसी राष्‍ट्रभक्‍ति‍ और मानवीयता को सम्‍पुष्‍ट करते थे। आकाशवाणी से प्रसारि‍त उनके राष्‍ट्रभक्ति‍-गीत दशकों तक भरत के कि‍शोरों एवं युवाओं को सम्‍मोहि‍त करते रहे हैं।
लोकजीवन की जीवन्‍तता प्रस्‍तुत करता मायानन्‍द मि‍श्र (1934-2013) रचि‍त उपन्‍यास माटी के लोग सोने की नैया जब सन् 1967 में राजकमल प्रकाशन से प्रकाशि‍त हुआ तो पूरे देश के सामान्‍य पाठकों ने उन्‍हें सि‍र-आँखों पर बि‍ठाया। उपन्‍यास के वि‍षय-प्रबन्‍ध, शि‍ल्‍प-संरचना एवं भाषा-व्‍यवहार में लोगों को फणीश्‍वरनाथ रेणु की लोकोन्‍मुख रचनाशीलता के सूत्र दि‍खने लगे थे। भारतीय स्‍वाधीनता के दो दशक बाद भी बि‍हार की शोकनदी के ताण्‍डव और मैथि‍ल जनजीवन की वि‍डम्‍बनाओं के चि‍त्र जि‍स चमत्‍कार से उस उपन्‍यास में व्‍यक्‍त हुए, उसकी बराबरी उस दौर के प्रखर उपन्‍यासकार फणीश्‍वरनाथ रेणु के सि‍वा अन्‍य कि‍सी से नहीं हो सकती थी। गौरतलब है कि‍ उस दौर के दो महान हि‍न्‍दीसेवी राष्‍ट्रकवि‍ रामधारी सिंह दि‍नकर और फणीश्‍वरनाथ रेणु स्‍वयं मैथि‍ल रचनाकार थे। यद्यपि‍ रेणु की रचनाएँ मैथि‍ली में गि‍नती के ही हैं। दि‍नकर की तो वह भी नहीं है। वे दोनों सदैव हि‍न्‍दी-सेवा में ही तल्‍लीन रहे। पर मायानन्‍द की केन्‍द्रीय रचनाशीलता एवं क्रि‍याशीलता मैथि‍ली के लि‍ए प्रति‍बद्ध थी। माटी के लोग सोने की नैया के प्रकाशन के बाद पाठकों को उनकी अगली रचना की आतुर प्रतीक्षा होने लगी थी। कि‍न्‍तु वे तो मूलत: मैथि‍ली के सि‍पाही थे, मैथि‍ली-लेखन एवं मैथि‍ली-आन्‍दोलन में ही सदैव तल्‍लीन रहे। गम्‍भीरतापूर्वक मैथि‍ली में लि‍खते रहे। अचानक से उनकी क्रि‍याशीलता बीसवीं शताब्‍दी के अन्‍ति‍म चरण में फि‍र जाग्रत हुई। और, एक के बाद एक उनके चार ऐति‍हासि‍क उपन्‍यास-- प्रथमं शैलपुत्री च (1990), मन्‍त्रपुत्र (1990), पुरोहि‍त (1999) और स्‍त्रीधन (2007) प्रकाशि‍त हुए। यद्यपि‍ इनका लेखन करीब-करीब साथ-साथ ही सम्‍पन्‍न हुआ था। ये कृति‍याँ हि‍न्‍दी के ऐति‍हासि‍क उपन्‍यास साहि‍त्‍य को अभूतपूर्व देन हैं। साहि‍त्‍य और इति‍हास का भेद समाप्‍त करती ये चारो कृति‍याँ आज तक के ऐति‍हासि‍क उपन्‍यास-लेखन के लि‍ए मानदण्‍ड उपस्‍थि‍त करती हैं। तथ्‍यात्‍मकता के प्रति‍ उपन्‍यासकार के आग्रह और रचनात्‍मक कौशल की वि‍लक्षणता के कारण बड़ी स्‍पष्‍टता से कहा जाता है कि‍ इतना हृद्य और इतना प्रामाणि‍क शायद ही कोई ऐति‍हासि‍क उपन्‍यास हो। गौरतलब है कि‍ मन्‍त्रपुत्र के मैथि‍ली संस्‍करण का प्रकाशन सन् 1986 में हुआ, जि‍से बाद में साहि‍त्‍य अकादेमी सम्‍मान भी मि‍ला। कि‍न्‍तु मायानन्‍द मि‍श्र या आरसी प्रसाद सिंह पर कि‍सी हि‍न्‍दी समालोचक की दृष्‍टि‍ नहीं गई।
भारतीय समाज-व्‍यवस्‍था, मानव-जीवन की दार्शनि‍कता तथा व्‍यंग्‍य की प्रहारक-क्षमता को एकमेक करते हुए हरि‍मोहन झा (सन् 1908-1984) ने 'खट्टर काका' के माध्‍यम से जि‍स तरह व्‍यंग्‍य की शैली को नवजीवन दि‍या वह समकालीन व्‍यंग्‍य-चि‍न्‍तन का प्रशि‍क्षण-शि‍वि‍र है। वैसी समृद्ध व्‍यंग्‍य-दृष्‍टि‍ अन्‍यत्र दुर्लभ है। हरिमोहन झा मैथि‍ली के ऐसे रचनाकार हैं जि‍न्‍होंने दर्शन जैसे गूढ़ वि‍षय को वार्तालाप शैली में ढालकर उसे सहज बना दि‍या। मि‍थि‍ला की दार्शनि‍क परम्‍परा के महान चि‍न्‍तक, संस्‍कृत एवं अंग्रेजी के वि‍शि‍ष्‍ट वि‍द्वान होने के बावजूद उन्‍होंने अपनी रचनात्‍मकता का केन्‍द्रीय क्षेत्र मैथि‍ली को बनाया। मैथि‍ली भाषा एवं साहि‍त्‍य में उनका अवदान तो जगजाहि‍र है ही; हि‍न्‍दी व्‍यंग्‍य और कथाधारा में भी उनका अमूल्‍य अवदान है। उनका व्‍यंग्‍य-वि‍धान गहन शोध का वि‍षय है। नई कहानी आन्‍दोलन के दौर की हि‍न्‍दी पत्रि‍काओं से उनकी रचनाओं को संकलि‍त कर अध्‍ययन कि‍ए जाने की बड़ी जरूरत है। इसी तरह नई कहानी आन्‍दोलन की ढलान-वेला में हि‍न्‍दी पत्रि‍काओं में राजमोहन झा, प्रभास कुमार चौधरी और गंगेश गुंजन की जि‍तनी धारदार कहानि‍याँ छपीं, वे नि‍श्‍चय ही उस दौर के हि‍न्‍दी कहानीकारों के लि‍ए प्रति‍स्‍पर्द्धा के प्रसंग थे। कि‍न्‍तु दुर्योगवश कि‍सी आलोचक ने उन रचनाओं का संज्ञान नहीं लि‍या। कीर्ति‍नारायण मि‍श्र एवं शेफालिका वर्मा की कवि‍ताएँ और मार्कण्‍डेय प्रवासी, शान्‍ति सुमन एवं बुद्धि‍नाथ मि‍श्र के नवगीतों से हि‍न्‍दी नवगीत वि‍धा का कोश नि‍रन्‍तर पुष्‍ट-परि‍पुष्‍ट हुआ है। हि‍न्‍दी के अप्रति‍म नाटककार रामेश्‍वर प्रेम एवं वि‍शि‍ष्‍ट उपन्‍यासकार/रि‍पोर्ताज लेखक शालि‍ग्राम ने यद्यपि‍ मैथि‍ली में कुछ नहीं लि‍खा, कि‍न्‍तु उनकी मातृभाषा मैथि‍ली है। परंच कीर्ति‍नारायण, गंगेश गुंजन, शेफालिका, शान्‍ति सुमन, बुद्धि‍नाथ, ज्‍योति‍वर्द्धन, उषाकि‍रण खान, नरेन्‍द्र, अग्‍नि‍पुष्‍प, हरेकृष्‍ण झा, विभा रानी, देवशंकर नवीन, कृष्‍णमोहन झा, तारानन्‍द वि‍योगी, शि‍वेन्‍द्र दास, ओमप्रकाश भारती, कि‍शोर केशव, अवि‍नाश, संजय कुन्‍दन, अरवि‍न्‍द ठाकुर, श्रीधरम, अजित आजाद, रमण कुमार सिंह, अरुणाभ सौरभ, मनीष अरवि‍न्‍द, गौरीनाथ आदि‍ की पहचान प्रथमत: मैथि‍ली के रचनाकारों के रूप में ही है, और वे नि‍रन्‍तर नि‍र्वि‍कार भाव से हि‍न्‍दी में भी लि‍ख रहे हैं। भाषि‍क-सांस्‍कृति‍क जागृति, साहि‍त्‍यि‍क समालोचना‍ एवं अनुवाद-पद्धति‍ से सम्‍बद्ध प्रसंगों पर महान चि‍न्‍तक, समालोचक म. म. उमेश मिश्र, रमानाथ झा, जयकान्‍त मि‍श्र; प्रसि‍द्ध भाषावैज्ञानि‍क सुभद्र झा; मैथि‍ली के वि‍शि‍ष्‍ट कवि‍-नाटककार एवं भाषावि‍द् उदयनारायण सिंह नचि‍केता का वि‍पुल लेखन मातृभाषा के अलावा हि‍न्‍दी एवं अंग्रेजी में भी उपलब्‍ध है। कि‍न्‍तु वे सब के सब नेपथ्‍य में पड़े हैं। दि‍ल्‍ली के नौजवान मैथि‍ल रंगकर्मि‍यों द्वारा संचालि‍त 'मैलोरंग' ऐसी पहली और अकेली मैथि‍ली नाट्य-संस्‍था है, जि‍से भारत सरकार की रेपटरी का दर्जा प्राप्‍त है। यह संस्‍था मैथि‍ली रंगकर्म को एकनि‍ष्‍ठता से समर्पि‍त है। कि‍न्‍तु मौका पाकर यह अपने ही कि‍ए मैथि‍ली नाटकों का हि‍न्‍दी रूपान्‍तरण अथवा कुछ खास-खास हि‍न्‍दी नाटकों का मंचन करती रहती है। हि‍न्‍दी, अंग्रेजी की पत्रकारि‍ता में मैथि‍लीभाषि‍यों के अवदान की ओर जाने पर बात बहुत आगे नि‍कल जाएगी, वह प्रसंग कभी और। अभी इतना संकेत पर्याप्‍त होगा कि‍ राष्‍ट्र-हि‍त में मैथि‍ली रचनाकारों के इन रचनात्‍मक अवदानों एवं उदारताओं का सम्‍मान करने के बजाय मैथि‍ली को हि‍न्‍दी की बोली प्रमाणि‍त करनेवालों की तादाद लगातार बढ़ती गई और वे अन्‍तत: लट्ठ लि‍ए खड़े हो गए।
इन सबकी पृष्‍ठभूमि‍ जानने और ति‍कड़म की गुत्‍थि‍याँ सुलझाने हेतु फि‍र वापस शुरुआती प्रसंग पर चलना होगा। उल्‍लेख हो चुका है कि‍ स्‍वाधीनता आन्‍दोलन के दौरान मैथि‍ली रचनाकार अपना समस्‍त क्षेत्रीय अनुराग त्‍यागकर हि‍न्‍दी के समर्थन में उतर आए थे। सर्वसुलभ उदाहरण तो चन्‍दा झा ही हैं। उनकी भाषि‍क उदारता देखकर हि‍न्दी आलोचकों के मन:क्षेत्र में दखल (इन्‍क्रोचमेण्‍ट) का फि‍तूर बीसवीं शताब्‍दी के शुरुआती दौर से ही सवार हो गया। हि‍न्‍दी के भग्यवि‍धाताओं ने साहि‍त्‍येति‍हास-लेखन में सर्वप्रथम वि‍द्यापति‍ पर कब्‍जा कि‍‍या; गाहे-बगाहे ज्‍योति‍रीश्‍वर को भी अपने खाते में दर्ज करते गए। और, क्रमश: मैथि‍ली को हि‍न्‍दी की बोली साबि‍त करने लगे। वि‍द्यापति‍ पर कब्‍जा करना तो उनकी मजबूरी थी, क्‍योंकि‍ उत्तर भारतीय जनभाषाओं की रचनाशीलता में प्रामाणि‍क वीरगाथा और कृष्‍ण-काव्‍य परम्‍परा की प्राचीनता साबि‍त करने हेतु उन्‍हें महाकवि‍ वि‍द्यापति‍ से बड़ा उदाहरण अन्‍य कोई नहीं मि‍लता। कि‍न्‍तु कब्‍जा कर लेने के बाद वि‍द्यापति‍ उन्‍हें सँभाले न सँभलें। वे असमंजस में थे कि‍ इन्‍हें सम्‍मान दि‍या भी जाए या नहीं; तनि‍क दे भी दि‍या जाए तो वीरगाथा लि‍खने के कारण वे उन्‍हें आदि‍काल में रखें या गीति‍काव्‍य, भक्‍ति‍-काव्‍य (शैव्‍य, शाक्‍त, वैष्‍णव, स्‍मार्त्त), शृंगारि‍क-काव्‍य के लि‍ए कोई नई व्‍यवस्‍था करें। नि‍तान्‍त प्रेमाश्रि‍त काव्‍य कीर्ति‍पताका को भी उन्‍होंने वीरगाथा में शामि‍ल कर लि‍या। जि‍न बारह कृति‍यों की प्रवृत्ति‍ देखकर आदि‍काल का नामकरण वीरगाथा-काल कि‍या, उस सूची की सबसे वि‍वादास्‍पद और अप्रमाणि‍क कृति‍ पर ग्रन्‍थ के ग्रन्‍थ लि‍ख मारे, कि‍न्‍तु उस सूची की सर्वाधि‍क प्रमाणि‍क कृति‍ कीर्ति‍लता और कीर्ति‍पताका के रचनाकार महाकवि‍ वि‍द्यापति‍ को दो अवतरणों में नि‍पटा लि‍या। वि‍दि‍त है कि‍ महाकवि‍ वि‍द्यापति‍ (सन् 1350-1439) की साहि‍त्‍य-साधना और सामाजि‍क सरोकार के उत्‍कर्ष से आज पूरा भारत गौरवान्‍वि‍त है। वे महान जनवादी और मानवीय सोच के रचनाकार थे। वर्चस्‍व-लोलुप शासकों की आक्रमणकारी हरकतों से उनके समय का भारतीय नागरि‍क-जीवन ह्रस्‍त-त्रस्‍त था। साम्राज्‍य-वि‍स्‍तार के आक्रामक अहंकार में फि‍रोजशाह तुगलक अपने सैनि‍कों के साथ दि‍ल्‍ली से बंगाल पर चढ़ाई करने मि‍थि‍ला के रास्‍ते ही जाते थे। युद्धोन्‍माद में जाते हुए और पराजय के अवसाद में लौटते हुए वे सैनि‍क जि‍‍स तरह मैथि‍ल-समाज को तबाह करते थे, उसकी कल्‍पना तक त्रासद थी। पूरा नागरि‍क परि‍दृश्‍य जीवन से नि‍राश हो गया था। शृंखलाबद्ध आक्रमणों से तहस-नहस हुई उस भारतीय जीवन-व्‍यवस्‍था में, जीवन से हताश उस दौर के जनसमूह में उन दि‍नों महाकवि‍ वि‍द्यापति‍ ने ही अपनी शृंगारि‍क रचनाओं द्वारा जीवन के प्रति‍ आसक्‍ति‍ जगाई, उनमें सकारात्‍मक ऊर्जा आई नीति‍ एवं आचारपरक रचनाओं से जन-मन में बोध और सदाचार का भाव भरा। अकादेमि‍क दुनि‍या में कीर्ति‍लता बेशक चर्चि‍त कृति‍ हो, पर तथ्‍यत: वि‍द्यापति‍ की लोकप्रि‍यता का मूल आधार उनकी कोमलकान्‍त पदावली ही है। भारतीय साहित्य की शृंगार एवं भक्ति परम्‍परा के वे प्रमुख स्‍तम्‍भ थेऐसे वि‍द्यापति‍ पर कब्‍जा जमाने की इच्‍छा तो हर कि‍सी को होगी।
आगे चलकर हि‍न्‍दी-उर्दू के संघर्ष के दि‍नों में वाराणसी के संस्‍कृत वि‍द्वानों ने एवं मि‍थि‍लांचल के बौद्धि‍कों ने हि‍न्‍दी का समर्थन कि‍या। राष्‍ट्रीय एकता एवं अखण्‍डता के समर्थन में मैथि‍लों ने अपनी लि‍पि‍ 'मि‍थि‍लाक्षर' त्‍यागकर देवनागरी में मैथि‍ली लि‍खना स्‍वीकार कर लि‍या।[2] उल्‍लेखनीय है कि‍ ब्राह्मी-लि‍पि‍ से वि‍कसि‍त 'मि‍थि‍लाक्षर' लि‍पि‍ को गुप्‍तकाल में 'ति‍रहुता' कहा जाता था। ऐसा सम्‍भवत: उस दौर में वि‍कसि‍त ति‍रहुत प्रान्‍त के कारण हुआ। बौद्ध-ग्रन्‍थ 'ललि‍त वि‍स्‍तर' में इसे 'वैदे‍ही' लि‍पि कहा गया।[3] वही 'मि‍थि‍लाक्षर' मैथि‍ली की अपनी लि‍पि‍ है। राष्‍ट्र-हि‍त में अपनी इस प्राचीन लि‍पि‍ को छोड़कर देवनागरी अपनाने की मैथि‍लों की इस उदारता ने हि‍न्‍दीवालों की दखल-नीति‍ को फि‍र से उत्‍साहि‍त कि‍‍या और वे तुमुल कोलाहल से मैथि‍ली को हि‍न्‍दी की बोली मानने लगे। राष्‍ट्रीय एकता के अनुरागी मैथि‍ल वि‍द्वानों की उदारता को इस तरह कमजोरी मान लेना बौद्धि‍क समाज का दुखद आचरण था। समान लि‍पि‍ में लि‍खे होने के कारण ऐसा भ्रम उचि‍त नहीं था। मैथि‍ली, हि‍न्‍दी की बोली कि‍सी हाल मे नहीं हो सकती। दोनों का वि‍कास भि‍न्‍न-भि‍न्‍न भाषा-स्रोत से हुआ है। सुनीति‍ कुमार चटर्जी जैसे नि‍वि‍ष्‍ट भाषावैज्ञानि‍क ने अरसा पहले स्‍पष्‍ट कर दि‍या था कि‍ मैथि‍ली का वि‍कास मागधी प्राकृत-अपभ्रंश से हुआ है, जबकि‍ हि‍न्‍दी का वि‍कास शौरसेनी प्राकृत से।[4] वे इस तथ्‍य की ओर जाना ही नहीं चाहते कि‍ सन् 1801 में एच. टी. कोलब्रुक ने मि‍थि‍ला भाषा के लि‍ए 'मैथि‍ली' शब्‍द का प्रयोग कि‍या। सुधी-जन लक्ष्‍य करेंगे कि‍ तब तक खड़ीबोली हि‍न्‍दी के जनक भारतेन्‍दु हरि‍श्‍चन्‍द्र का अवतरण नहीं हुआ था। सन् 1881 में ग्रि‍यर्सन ने मैथि‍ली क्रि‍स्‍टोमेथी की रचना की। सन् 1882 में उन्‍होंने मैथि‍ली व्‍याकरण पर काम कि‍या। सन् 1886 में कवीश्‍वर चन्‍दा झा ने मि‍थि‍ला भाषा रामायण की रचना पूरी की। सन् 1887 में फारसी की जगह राजभाषा के रूप में भारतीय भाषाओं के उपयोग को मान्‍यता मि‍ली[5], जि‍ससे भारतीय मानस में नि‍जभाषा एवं संस्‍कृति‍ के प्रति‍ गौरव-बोध बढ़ा। सन् 1911 में जॉर्ज अब्राहम ग्रि‍यर्सन ने (सन् 1851-1941) अपने 'लिंग्‍वि‍स्‍टि‍क सर्वे ऑफ इण्‍डि‍या' में मैथि‍लीभाषि‍यों की संख्‍या डेढ़ करोड़ मानी[6], जो आज चार करोड़ हो गई है। इन समस्‍त साक्ष्‍यों से नजरें फेरकर वे बलजोरी करते जाएँ तो यह उनकी मर्जी है, वे करते रहें। उल्लेखनीय है कि लिंग्विस्टिक सर्वे ऑफ इण्डियाका महान कार्य ग्रियर्सन महोदय ने सन् 1898 में शुरू किया था, जो सन् 1928 में पूरा हुआ, मैथिली के सन्दर्भ में सन् 1911 में ही वे नतीजे पर पहुँच चुके थे।
असल में हि‍न्‍दीवालों द्वारा मैथि‍ली-हि‍न्‍दी वि‍वाद का यह झमेला सन् 1914 में कलकत्ता वि‍श्‍ववि‍द्यालय में वि‍द्यापति‍ चेयर और मैथि‍ली वि‍भाग की स्‍थापना के साथ तीव्रतर हुआ था। उस वि‍रोध की नि‍रन्‍तरता का परि‍णाम हुआ कि‍ सन् 1917 में बि‍हार में स्‍थापि‍त पटना वि‍श्‍ववि‍द्यालय में मैथि‍ली के अध्‍ययन-अध्‍यापन की स्‍वीकृति‍ नहीं दी गई। सन् 1948 में आकर पटना वि‍श्‍ववि‍द्यालय में मैथि‍ली को मान्‍यता मि‍ली।[7] कि‍न्‍तु मैथि‍ल-जन कभी अपनी उदारता से नहीं डि‍गे। राष्‍ट्रीय एकता के मसले पर सारे द्वन्‍द्वों का त्‍याग उनका सहज स्‍वभाव था और है। इति‍हास साक्षी है कि‍ द्रवि‍ड़ लिंगदेव और वैदि‍क रुद्र के समन्‍वयन के पश्‍चात् जब शि‍व-कल्‍पना अस्‍ति‍त्‍व में आई तो सर्वप्रथम शतरुद्रीय प्रकरण में उनका सम्‍बन्‍ध हि‍मालयराज की कन्‍या पार्वती से कराकर उत्तर-दक्षि‍ण को भावनात्‍मक स्‍तर पर जोड़ने का प्रयास करने वाले शुक्‍ल यजुर्वेद के प्रवक्‍ता याज्ञवल्‍क्‍य मैथि‍ल ही थे।[8]
चि‍न्‍तनीय कि‍न्‍तु सच है कि‍ इन षड्यन्‍त्रों से मैथि‍ली की जान कभी छूटी नहीं। आगे चलकर जब भाषावार राज्‍य के गठन की बात आई, तो 'मगध-मि‍थि‍ला' नामकरण का प्रस्‍ताव नि‍रस्‍तकर 'बि‍हार' नाम रखा गया[9], ताकि‍ भाषा का कोई व्‍यवधान न आए। स्‍पष्‍टत: मैथि‍ली कहीं की भाषा नहीं मानी गई। फि‍र मैथि‍लों की सक्रि‍यता को अशक्‍य बनाने हेतु बि‍हार सरकार ने नीति‍गत तरीके से 'अंगि‍का भाषा और साहि‍त्‍य' तथा 'बज्‍जि‍का भाषा और साहि‍त्‍य' शीर्षक पुस्‍तक बि‍हार राष्‍ट्रभाषा परि‍षद् से प्रकाशि‍त करवाई। और, उस दौर के दो महत्त्‍वपूर्ण वि‍द्वान माहेश्‍वरी सिंह महेश को अंगि‍का के लि‍ए तथा रामवृक्ष बेनीपुरी को बज्‍जि‍का के लि‍ए मोहरा बनाया।[10] मैथि‍ली के लि‍ए बि‍हार सरकार का इस तरह तंगदि‍ल होना हैरतअंगेज है। यह कि‍सी वि‍डम्‍बना से कम नहीं कि‍ जि‍न्‍हें 'छि‍काछि‍की' और 'पश्‍चि‍मी मैथि‍ली' के नाम से ग्रि‍यर्सन जैसे वि‍द्वान ने सन् 1911 में मैथि‍ली की उपभाषा का दर्जा दि‍या; और प्रसि‍द्ध भाषावि‍द् सुनीति‍ कुमार चटर्जी ने भी उनका समर्थन कि‍या; बि‍हार सरकार उन्‍हें भाषा कहकर, कि‍ताब छपवाकर, मैथि‍ली की कमर तोड़ने को उद्यत हो उठी। वैसे बि‍हार सरकार का वह कोई इकलौता खेल नहीं था। ग्रि‍यर्सन के 'लिंग्‍वि‍स्‍टि‍क सर्वे ऑफ इण्‍डि‍या' में जि‍न मैथि‍लीभाषि‍यों की संख्‍या सन् 1911 में डेढ़ करोड़ थी[11], बि‍हार की जनगणना रि‍पोर्ट में सन् 1951 में वह नब्‍बे हजार हो गई और सन् 1961 में साठ लाख। इसके दोषी दो थे-- पहले तो रोजमर्रे के कामों में व्‍यस्‍त, छल-छद्मों से बेफि‍क्र सामान्‍य नागरि‍क, जि‍न्‍होंने कभी गणना-कर्मचारी से पूछा नहीं कि‍ उनकी मातृभाषा क्‍या लि‍खी गई? दूसरे जनगणना-अधि‍कारी, जो मुर्गी, कबूतर, बकरी, भैंस की संख्‍या से भी ज्‍यादा गैरजरूरी मातृभाषा पूछना समझते थे। इस एक आलस्‍य के कारण उन्‍हें गणना-प्रपत्र भरने में तो सुवि‍धा हो जाती थी, पर वे अन्‍दाज नहीं लगा पाते थे कि‍ इस आलस्‍य से वे भाषा और संस्‍कृति‍ के खाते में कैसा जघन्‍य अपराध कर रहे हैं। इस  हास्‍यास्‍पद स्‍थि‍ति‍ पर कोई कि‍तना हँसे! बाद के दि‍नों में फि‍र रामवि‍लास शर्मा ने जयकान्‍त मि‍श्र लि‍खि‍त 'ए हि‍स्‍ट्री ऑफ मैथि‍ली लि‍ट्रेचर' में उद्धृत कुछ प्रसंगों का उदाहरण देकर लेख लि‍खा और कहा कि‍ ये सारे कथन तो सर्वजन बोधगम्‍य हैं, फि‍र मैथि‍ली अलग भाषा कैसे हुई? उनके उस जि‍ज्ञासा का सर्ववि‍धि‍ समाधान बाबा यात्री ने आर्यावर्त में छपे अपने लेख में कर दि‍या। पर हि‍न्‍दीवाले समय-समय पर उस घाव को खोद-खोदकर हरा करते रहे। नि‍रन्‍तर ढेकी कूटते रहे, रसनचौकी बजाते रहे। रामवि‍लास जी का वह लेख बार-बार छपता गया, जि‍सका कभी कि‍सी ने कोई प्रति‍कार नहीं किया। दीर्घ-काल से जारी उनका यह प्रयास आज भी कायम है। उल्‍लेखनीय है कि‍ अवांछि‍त दखल की उनकी यह नीति‍ साम्राज्‍य-वि‍स्‍तार तक सीमि‍त है, उनके मन में मैथि‍ली भाषा एवं साहि‍त्‍य के लि‍ए कोई सम्‍मान-भाव नहीं है।
मैथि‍ली रचनाकारों की जि‍स उदारता का उल्‍लेख यहाँ हुआ है, वह कोई नई बात भी नहीं है। यह मि‍थि‍ला की प्राचीन परि‍पाटी है। ज्ञान-वि‍ज्ञान से मि‍थि‍ला और मैथि‍ल का पुराना नाता रहा है। मानवता के विकास हेतु बौद्धि‍कों के बीच तर्क-वि‍तर्क यहाँ दीर्घकाल से होता रहा है। कर्म, ज्ञान और भक्ति वि‍षयक वि‍चार-वि‍मर्श यहाँ सर्वदा होता रहा है। राष्‍ट्रोत्‍थान एवं मानवीयता की रक्षा हेतु वे समस्‍त संकीर्णताओं का परि‍त्‍याग कर वि‍चार-वि‍मर्श करते थे। अष्टावक्र गीता के रचयि‍ता महान तत्त्‍ववेता अष्टावक्र राजा जनक के समकालीन थे। पुराण वर्णि‍त कथानुसार उन्‍हें मातृ-गर्भ में ही उन्‍हें सम्‍पूर्ण वेद-बोध हो गया था। मातृ-गर्भ से ही उन्‍होंने एक दि‍न अशुद्ध वेद-पाठ करते हुए अपने पि‍ता का खण्‍डन कि‍या तो पिता क्रुद्ध हो उठे और आठ बार व्‍यवधान उत्‍पन्‍न करने के अपराध में उन्‍हें आठ अंगों से वक्र होने का शाप दि‍या। कहा जाता है कि‍ वे जन्‍म से ही आठो अंग से वक्र थे, इसीलि‍ए उनका नाम अष्टावक्र पड़ा। अपने ज्ञान-बल से उन्‍होंने राजा जनक के दरबार में आयोजि‍त शास्‍त्रार्थ में न केवल उपस्‍थि‍त पण्‍डि‍तों को चकि‍त कर दि‍या बल्‍कि‍ बालपन में जनक को भी उनकी यज्ञशाला में पहुँचकर अपनी तर्कबुद्धि‍ और ज्ञान-कौशल से चमत्‍कृत कर दि‍या। अन्‍तत: शास्त्रार्थ में सभी पण्‍डि‍तों ने उनकी श्रेष्ठता स्वीकारी।  
शुक्ल यजुर्वेद की वाजसनेयी शाखा के द्रष्टा, नेति नेति के प्रवर्तक, मि‍थि‍ला नरेश जनक के दरबार में हुए शास्त्रार्थ के पूज्यास्‍पद दार्शनि‍क याज्ञवल्क्य (ई.पू. सातवीं सदी) मि‍थि‍ला के ऐसे तत्त्‍वद्रष्‍टा हैं, जि‍नसे पूर्व शास्त्रार्थ और दर्शन की परम्‍परा में किसी ऋषि का नाम नहीं लिया जाता। वे अपने समय के सर्वोपरि वैदिक ज्ञाता थे। शतपथ ब्राह्मण की रचना उन्‍होंने ही की। उपनिषद काल की परम विदुषी, वेदज्ञ और ब्रह्माज्ञानी महिला गर्गवंशोद्भव गार्गी, ऋषि याज्ञवल्क्य की समकालीन थीं। मि‍थि‍ला नरेश जनक के दरबार में आयोजि‍त शास्‍त्रार्थ में उन्‍होंने ऋषि याज्ञवल्क्य से प्रश्‍न कि‍या था। उल्‍लेखनीय है कि‍ गार्गी द्वारा शालीन और संयमि‍त पद्धति‍ से पूछे गए ब्रह्मविषयक प्रश्नों के कारण ही बृहदारण्यक उपनिषद रचा गया। कहते हैं कि‍ परम तत्त्वज्ञानी याज्ञवल्क्य से प्रश्न करते हुए वे कभी पल भर के लि‍ए भी उत्तेजित, वि‍चलि‍त या भयभीत नहीं हुईं। वैदिक काल की परम विदुषी, ब्रह्मवादिनी स्त्री मैत्रेयी, मित्र ऋषि की पुत्री और महर्षि याज्ञवल्क्य की दूसरी पत्नी थीं। बृहदारण्यक उपनिषद में हुए उल्‍लेख के अनुसार महर्षि‍ याज्ञवल्क्य उनसे अनेक आध्‍यात्मिक विषयों पर गहन चर्चा करते थे। सम्‍भवत: इस कारण उन्‍हें पति‍ का स्‍नेह अपेक्षाकृत अधि‍क मि‍लता था। फलस्‍वरूप बड़ी सौत कात्यायनी उनसे बड़ी ईर्ष्या करती थीं। चर्चा है कि‍ संन्यास लेने से पूर्व जब महर्षि‍ याज्ञवल्क्य ने समस्‍त भौति‍क सम्‍पदा दोनो पत्‍नि‍यों में बाँटने की बात की तो मैत्रेयी ने अपने हि‍स्‍से की सम्‍पति‍ कात्‍यायनी को दे देने का आग्रह कि‍या और अपने लि‍ए आत्मज्ञान क उत्‍कृष्‍ट अवदान माँगा। वि‍दि‍त है कि छहो भारतीय दर्शन--सांख्य, योग, न्याय, वैशेषिक, मीमांसा और वेदान्‍त; के प्रणेता ऋषि क्रमश: कपिल, पतंजलि, गौतम, कणाद, जैमिनि और बादरायण थे इनमें से सांख्‍य, न्याय, मीमांसा और वैशेषिक -- चार धाराओं के वि‍कास का गहन सम्‍बन्‍ध मि‍थि‍ला से ही है।
सांख्य दर्शन के प्रवर्तक, तत्त्‍व-ज्ञान के उपदेशक कपि‍ल मुनि‍ मिथिला के थे। वे निरीश्वरवादी थे। उन्‍होंने कर्मकाण्ड के बजाय ज्ञानकाण्ड को महत्त्‍व दि‍या और ध्यान एवं तपस्या का मार्ग प्रशस्त कि‍या। तत्त्‍व समाससूत्र एवं सांख्य प्रवचनसूत्र उनकी प्रसिद्ध कृति‍याँ हैं।
प्रमाण आधारि‍त अर्थ-परीक्षण को न्याय कहा जाता है। दर्शन की इस धारा के प्रवर्तक गौतम को वेद में मन्त्र-द्रष्टा ऋषि माना गया है। उनके मिथिलावासी होने का संकेत स्कन्द पुराण में भी है। महर्षि‍ गौतम के न्यायसूत्रों पर महर्षि‍ वात्स्यायन ने भाष्य लि‍खा, और उस भाष्य पर उद्योतकर ने वार्तिक लिखा। आगे 'न्यायवार्तिक तात्पर्य टीका' शीर्षक से उस वार्तिक की व्याख्या वाचस्पति मिश्र ने लिखी। फि‍र 'तात्‍पर्य-परिशुद्धि' शीर्षक से उस टीका की टीका उदयनाचार्य ने लिखी। ये सभी आचार्य मि‍थि‍ला के थे। वाचस्पति मिश्र (सन् 900-980) तो अन्‍हराठाढी (मधुबनी) के थे। तत्त्वबिन्दु शीर्षक मूल ग्रन्थ की रचना के अलावा उनकी लि‍खी कई टीकाएँ हैं, जि‍नमें प्रमुख हैं न्यायकणिका एवं तत्त्वसमीक्षा (मण्डन मिश्र रचि‍त ग्रन्‍थ विधिविवेक एवं ब्रह्मसिद्धि की टीका) तथा भामती (ब्रह्मसूत्र की टीका)। नव्य-न्याय दर्शन पर उन्‍होंने ही आरम्भिक कार्य किया, जिसे मिथिला के गंगेश उपाध्याय (तेरहवी शताब्‍दी) ने आगे बढ़ाया। वाचस्पति मिश्र द्वि‍तीय (सन् 1410-1490) भी मि‍थि‍ला (समौल, मधुबनी) के ही माने जाते हैं। सम्‍भवत: वे राजा भैरव सिंह के समकालीन थे। उनके लि‍खे कुल इकतालि‍स ग्रन्‍थों की सूचना है; दस दर्शनपरक, इकत्तीस स्मृतिपरक
न्याय-वैशेषिक दर्शन के मूर्द्धन्य आचार्य और प्राचीन न्याय-परम्‍परा के अन्‍तिम प्रौढ़ नैयायिक उदयनाचार्य (दसवी शताब्‍दी का अधोकाल) मिथिला के करियौन गाँव के थे। आस्तिकता के समर्थन में रचि‍त उनकी पाण्डित्यपूर्ण कृति‍ न्यायकुसुमांजलि एक वि‍शि‍ष्‍ट ग्रन्‍थ है।
मीमांसासूत्र जैसे वि‍शि‍ष्‍ट ग्रन्‍थ के रचयि‍ता कुमारिल भट्ट मिथिला के ही थे। वे महान दार्शनिक थे। प्रकाण्‍ड अद्वैत चि‍न्‍तक मण्‍डन मिश्र (सन् 615-695) ने उन्‍हीं के सान्‍नि‍ध्‍य‍ में मीमांसा दर्शन का अध्ययन कि‍या। माधवाचार्य रचि‍त कल्‍पि‍त कृति‍ शंकरदि‍ग्‍वि‍जय के सहारे एक भ्रम फैलाया गया कि‍ शंकराचार्य (सन् 632-664) ने शास्त्रार्थ में मण्डन मिश्र को पराजित कर सुरेश्वराचार्य नाम से अपना शिष्य बनाया और शारदा-पीठ का मठाधीश बनाया, पर वह कथा पूरी तरह कपोल कल्पना है। तथ्‍य से इस कल्‍पि‍त कथा का दूर-दूर का सम्‍बन्‍ध नहीं है। मण्‍डन मि‍श्र की छह प्रसि‍द्ध कृति‍याँ हैं-- ब्रह्मसिद्धि, भावना-विवेक, मीमांसानुक्रमणिका, वि‍भ्रम-विवेक, विधि-विवेक, एवं स्फोट-सिद्धि। उसी कल्‍पि‍त कृति‍ शंकरदि‍ग्‍वि‍जय के सहारे यह भी कहा जाता है कि‍ मण्‍डन मि‍श्र की पत्‍नी भारती भी प्रकाण्‍ड वि‍दुषी थीं, पर प्रमाणि‍क साक्ष्‍य के अभाव में इस बात पर वि‍श्‍वास करना कठि‍न है, क्‍योंकि‍ एक दूसरे शंकरदि‍ग्‍वि‍जय में मण्‍डन मि‍श्र की पत्‍नी का नाम शारदा बताया गया है। मेरी संकुचि‍त जानकारी में महाकवि कालिदास के मि‍थि‍ला के होने का कोई प्रमाणि‍क साक्ष्‍य नहीं दि‍खता, परन्‍तु मि‍थि‍ला के लोग जब-तब दावा करते हैं। इस धारा में आगे केशव मिश्र , अयाची मि‍श्र, शंकर मिश्र जैसे असंख्‍य नामों का उल्‍लेख ज्ञान-तत्त्‍व वि‍मर्श के क्षेत्र में सोदाहरण कि‍या जा सकता है। इन उदाहरणों का उद्देश्‍य सि‍र्फ समकालीन नवचि‍न्‍तकों को सूचना देना है कि‍ उन्‍नीसवी-बीसवी-इक्‍कीसवी शताब्‍दी के मैथि‍लों ने कि‍सी असावधानी या अज्ञानता में अपनी भाषा की अवमानना को आमन्‍त्रण नहीं दि‍या। उन सब ने तो अपने पूर्वजों द्वारा संस्थापि‍त ज्ञान-परम्‍परा, मानवीयता एवं राष्‍ट्रीयता की अवधारणा के वि‍कास में अपना योगदान दि‍या। क्‍योंकि‍ मानवता के विकास हेतु कर्म, ज्ञान और भक्ति वि‍षयक वि‍चार-वि‍मर्श हमारे पूर्वज दीर्घकाल से करते आ रहे हैं, उसके संवर्द्धन में अपनी भूमि‍का नि‍भाते आए हैं। अब इसका अन्‍यथा उपयोग कोई कर लें तो क्‍या कि‍या जा सकता है! वि‍गत छह-सात दशकों से हमारा देश तो ऐसे नागरि‍कों का देश हो गया है, जहाँ लोग दूसरों की त्रासदी को भी अपने पक्ष में भुनाने के अभ्यस्‍त हो गए हैं। पर इतना तय है कि‍ हमें अपनी इस भव्‍य वि‍रासत पर आधुनि‍क पद्धति‍ से शोध अवश्‍य करना चाहि‍ए।
अपने पूर्वजों एवं समकालीनों के नैष्‍ठि‍क भाषा-प्रेम, राष्‍ट्र-प्रेम एवं भाषि‍क उदारता के उल्‍लेख के साथ यहाँ मेरा उद्देश्‍य अपने सभ्‍य समाज को सूचि‍त करना है कि इति‍हास के पृष्‍ठों में दबे इन तथ्‍यों पर वि‍चार हो। दुनि‍या देखे कि‍ इतनी प्राचीन और समृद्ध रचना-धारा वाली मधुरतम भाषा मैथि‍ली के साथ व्‍यवस्‍था, गुटबन्‍दी एवं प्रशासनि‍क षड्यन्‍त्रों का कैसा-कैसा खेल खेला गया है, खेला जा रहा है। यह कोई इति‍हास-लेखन नहीं है, कोई गहन-गुह्य आवि‍ष्‍कार नहीं है। यहाँ-वहाँ बि‍खरे तथ्‍यों का संकलन है। सम्‍भव है कि‍ कई लोगों को इनकी जानकारी पहले से हो, कि‍न्‍तु अब इस पर सूक्ष्‍मतापूर्वक वि‍चार करने की जरूरत है। तात्त्‍वि‍क चि‍न्‍तन के साथ इस दि‍शा में कि‍या गया शोध नि‍श्‍चय ही मैथि‍ल-अस्‍मि‍ता और अन्‍तत: भारतीय-अस्‍मि‍ता के हि‍त में होगा। भाषा, संस्‍कृति‍ और वि‍रासत के प्रति‍ नि‍रपेक्षता लगभग कृतघ्‍नता और आत्‍महत्‍या के बराबर है। भारतीय संस्‍कृति‍ में और दुनि‍या के सभी धर्मों में ईशभक्‍ति‍ में शीष झुकाने का मानवीय आचार इसीलि‍ए है कि‍ घर से बाहर पाँव रखने से पहले हम वि‍नम्र होना सीखें। वि‍नम्रता कायरता नहीं है और उद्यमि‍यों का सम्‍मान चाटुकारि‍ता नहीं है। अमानवीय आचरणों के तुमुल कोलाहल के बावजूद आज अकारण ही सम्‍मान हेतु दी-ली गई राशि‍ को आयकर मुक्‍त नहीं माना जाता। वि‍चारणीय है कि‍ जि‍स भूखण्‍ड का नागरि‍क अपनों का सम्‍मान नहीं करता उसका सम्‍मान दुनि‍या में कहीं नहीं होता।‍ इसलि‍ए हम अपने नायकों का सम्‍मान करना, अपनी वि‍रासतीय भव्‍यता पर गौरवान्‍वि‍त होना सीखें। अन्‍ति‍म बात, कि‍ जि‍न समकालीनों एवं दि‍वंगत वि‍द्वानों का जि‍क्र इस आलेख में नहीं हो पाया, उनके प्रति‍ मेरा कोई वैर-भाव नहीं है। यह मेरी अज्ञता है कि‍ इस आलेख को पूरा करते समय मेरे स्‍मरण में उनका अवदान प्रकट नहीं हुआ। जि‍नकी चर्चा यहाँ नहीं हुई, कहीं और, कोई और अवश्‍य करेंगे।



देवशंकर नवीन का जन्म 02 अगस्त, 1962 को मोहनपुर, सहर्षा (बिहार) में हुआ। एम.ए., पी-एच.डी.(हिन्दी, मैथिली), एम.एस-सी.(भौतिकी), पी.जी.डिप्लोमा(पुस्तक प्रकाशन, अनुवाद) की उपाधियाँ देश के विभिन्न विश्वविद्यालयों से प्राप्त कीं। जी.एल.ए. कालेज, डालटनगंज में छह वर्षों तक अध्यापन, नेशनल बुक ट्रस्ट के सम्पादकीय विभाग में सोलह वर्षों तक  उल्लेखनीय योगदान, अनुवाद अध्ययन एवं प्रशिक्षण विद्यापीठ, इन्दिरा गाँधी राष्ट्रीय मुक्त विश्वविद्यालय में पाँच वर्षों तक अध्यापन के बाद फिलहाल भारतीय भाषा केन्द्र, जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय में प्रोफेसर पद पर कार्यरत हैं। अनुवाद अध्ययन, तुलनात्मक साहित्य, राजकमल चैधरी का साहित्य, मध्ययुगीन भ्क्ति साहित्य, एवं प्रकाशन तकनीक में उनकी विशेष रुचि है। मैथिली एवं हिन्दी में प्रकाशित उनकी मूल, अनूदित तथा सम्पादित लगभग चार दर्जन पुस्तकों  में से प्रमुख हैं: पहचान, हाथी चलए बजार(कहानी), आधुनिक मैथिली साहित्यक परिदृश्य, मध्ययुगीन भक्ति आन्दोलन एवं कृष्ण काव्य की परम्परा, राजकमल चौधरी: जीवन और सृजन, गीतिकाव्य के रूप में विद्यापति पदावली, मैथिली साहित्य: दशा, दिशा, सन्दर्भ (आलोचना)। राजकमल चौधरी की रचनाओं के कई संकलन एवं आठ खण्डों की रचनावली के अलावा सम्पादित कृतियाँ हैं--उत्तर आधुनिकता: कुछ विचार (आलोचना), अक्खर खम्भा आदि। कई अनूदित पुस्तकें भी प्रकाशित। अंग्रेजी सहित कई अन्य भारतीय भाषाओं में रचनाएँ अनूदित। जीवन एवं लेखन, भाषा एवं व्यवहार, रचना एवं कर्म में समानता रखना; विपरीत आचरण करनेवालों का विरोध करना अपना धर्म समझते हैं।
सम्पर्क: भारतीय भाषा केन्द्र, जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय, नई दिल्ली 110067
ई मेल: deoshankar@hotmail.com


[1] मायानन्‍द मि‍श्र/अकथ कथा/पृ. 24
[2] पृ. 66 
[3] पृ. 17
[4] पृ. 17
[5] पृ. 11, 12
[6] पृ. 15
[7] पृ. 14
[8] पृ. 32
[9] पृ. 66
[10] पृ. 68
[11] पृ. 15

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